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इबादत का महीना रोज़ा, इफ्तार, सहरी, तरावीह, ज़कात को समझिए। नेसार अहमद खान वारसी

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सलीम मंसूरी की रिपोर्ट

जमानियां। इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र और बरकतों वाला महीना माना जाता है. यह हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना होता है. माना जाता है कि इसी महीने में अल्लाह ने इंसानों की रहनुमाई के लिए पवित्र कुरान नाज़िल की थी। इसलिए रमजान सिर्फ रोज़ा रखने का महीना नहीं, बल्कि आत्म शुद्धि, सब्र, इबादत और इंसानियत का महीना है। शांति एकता कमेटी के सरपरस्त नेसार अहमद खान वारसी ने बताया कि इबादत का महीना रोज़ा इफ्तार, सहरी, तरावीह, ज़कात को समझिए क्यों कि। उन्होंने कहा कि रमजान सिर्फ रोज़ा रखने का महीना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सब्र, इबादत और इंसानियत का महीना है। माना गया है। कि इसी महीने में अल्लाह ने इंसानों की रहनुमाई के लिए पवित्र कुरान नाज़िल की थी। खान ने कहा कि माह ए रमजान इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र और बरकतों वाला महीना माना गया है। यह हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना होता है। माना जाता है कि इसी महीने में अल्लाह ने इंसानों की रहनुमाई के लिए पवित्र कुरान नाज़िल की थी। इसलिए रमजान सिर्फ रोज़ा रखने का महीना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सब्र, इबादत और इंसानियत का महीना है। रोज़ा (सौम) का मतलब है। की खुद को बुराइयों से रोकना. रोज़ा रखने वाला व्यक्ति सुबह फज्र से पहले सहरी खाता है। और फिर सूर्यास्त तक कुछ भी खाता-पीता नहीं है। लेकिन रोज़ा सिर्फ भूखा-प्यासा रहना नहीं है। इसमें झूठ, गाली, झगड़ा, बुरी नजर और गलत कामों से भी दूर रहना शामिल है। रोज़ा इंसान को सब्र करना सिखाता है। और गरीबों की भूख का एहसास कराता है। बताया जाता है। की सहरी वह खाना है। जो सुबह सूरज निकलने से पहले खाया जाता है। इसे बरकत वाला भोजन माना गया है। इसमें हल्का, पौष्टिक और पानी से भरपूर खाना खाने की सलाह दी जाती है। ताकि दिनभर शरीर में ऊर्जा बनी रहे। समय पर सहरी करना सुन्नत भी माना गया है। सूर्यास्त के समय जब मगरिब की अज़ान होती है। तब रोज़ा खोला जाता है। इसे इफ्तार कहते हैं। आमतौर पर खजूर और पानी से इफ्तार किया जाता है। क्योंकि यही तरीका मोहम्मद साहब ने बताया था। इफ्तार के बाद मगरिब की नमाज़ पढ़ी जाती है। मस्जिदों और घरों में सामूहिक इफ्तार का आयोजन होता है। जिससे भाईचारा और एकता बढ़ती है। तरावीह रमजान की खास रात की नमाज़ है। जो इशा की नमाज़ के बाद पढ़ी जाती है। इसमें कुरान की तिलावत की जाती है। आमतौर पर 8, 12 या 20 रकअत तरावीह पढ़ी जाती है। इसे पढ़ने से बहुत सवाब मिलता है। मस्जिदों में लोग मिलकर तरावीह अदा करते हैं। लेकिन इसे घर पर भी पढ़ा जा सकता है। यह नमाज़ इंसान को अल्लाह के और करीब लाती है। ज़कात इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है। जो मुसलमान एक तय सीमा (निसाब) से ज्यादा माल के मालिक होते हैं। उन्हें अपनी कुल बचत का 2.5% गरीबों और जरूरत मंदों को देना होता है। निसाब सोने या चांदी की कीमत के आधार पर तय होता है। ज़कात से समाज में आर्थिक संतुलन बनता है। और जरूरतमंदों की मदद होती है। रमजान हमें सिखाता है। कि इंसान सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी जिए। यह महीना सब्र, शुक्र, दया और भाईचारे का पैगाम देता है। जो लोग सच्चे दिल से इबादत करते हैं। वे इस महीने में अपने गुनाहों की माफी और दिल की सफाई की दुआ करते हैं।

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