लखनऊ/वाराणसी। उन्नाव रेप कांड केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि सत्ता, दबाव और न्याय व्यवस्था की परीक्षा बन चुका है। इस मामले में दोषी ठहराए गए पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को उम्रकैद की सजा मिली, लेकिन सजा-स्थगन जैसे फैसलों ने एक बार फिर देशभर में आक्रोश और बहस को जन्म दे दिया है। जनता के बीच इस प्रकरण को लेकर गहरी पीड़ा, गुस्सा और विविध विचार देखने को मिल रहे हैं।इस कांड में पीड़िता ही नहीं, बल्कि उसका पूरा परिवार भय और उत्पीड़न का शिकार हुआ। पीड़िता के पिता को कथित तौर पर झूठे मुकदमे में जेल भेजा गया, जहां संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई। परिवार का आरोप रहा कि यह मौत न्याय की लड़ाई को दबाने का परिणाम थी। इसके बाद भी अत्याचार का सिलसिला नहीं रुका।पीड़िता के चाचा को न्याय की मांग करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। दिनदहाड़े उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई, जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। परिवार के अन्य सदस्यों को लगातार धमकियां मिलीं, सामाजिक बहिष्कार और मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ा।सबसे भयावह घटना तब सामने आई, जब पीड़िता एक सड़क हादसे का शिकार हुई। ट्रक से टक्कर की इस घटना में पीड़िता गंभीर रूप से घायल हुई, जबकि उसकी मौसी की मौके पर ही मौत हो गई। हादसे को लेकर भी सवाल उठे और इसे महज़ दुर्घटना मानने से इंकार किया गया। जनता के एक बड़े वर्ग का मानना है कि यह हादसा नहीं, बल्कि पीड़िता को डराने और चुप कराने की कोशिश थी।आज जब दोषी को सजा-स्थगन जैसी राहत मिलती है, तो आम लोग सवाल उठा रहे हैं—यह कैसी न्याय व्यवस्था है, जहां पीड़िता का पूरा परिवार उजड़ जाता है, लेकिन आरोपी को कानूनी राहतें मिल जाती हैं। सामाजिक संगठनों और महिलाओं का कहना है कि ऐसे फैसले न्याय पर से भरोसा कमजोर करते हैं और पीड़ितों को हतोत्साहित करते हैं।वहीं कुछ लोग यह भी कहते हैं कि कानून में अपील और सजा-स्थगन का प्रावधान सभी के लिए है और न्यायिक प्रक्रिया को अपना रास्ता तय करने देना चाहिए। लेकिन जनता के विविध मतों के बीच एक बात पर लगभग सर्वसम्मति है—पीड़िता और उसके परिवार को पूर्ण सुरक्षा, सम्मान और न्याय मिलना चाहिए।उन्नाव रेप कांड आज भी यह सवाल छोड़ जाता है कि क्या न्याय केवल फैसला सुनाने तक सीमित है, या पीड़िता के जीवन, सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी भी उसी व्यवस्था की है। रिपोर्ट: नवीन प्रकाश।