*प्रसादादस्य लोकोऽयं चेष्टमान: प्रदृश्यते
*अस्मिनभ्युदिते सर्वमुदेदस्तमिते सति।*
*तस्मादत: परं नास्ति न भूतं न भविष्यति*
*यो वै वेदेषु सर्वेषु परमात्मेति गीयते।।*
इन्हीं की (भगवान् सूर्यदेव की) इच्छा से यह सम्पूर्ण चराचर जगत उत्पन्न हुआ है। इन्हीं से यह जगत् स्थित रहता,अपने अर्थ में प्रवृत्त होता तथा चेष्टशील होता हुआ दिखलाई पड़ता है। इनके उदय होने पर सभी का उदय होता है और अस्त होने पर अस्तङ्गस्त हो जाते हैं।जब ये अदृश्य होते हैं तो फिर कुछ भी यहां नहीं दीख पड़ता। तात्पर्य यह कि इनसे श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है, न हुआ है और न भविष्य में होगा ही। अतः समस्त वेदों में ‘परमात्मा’ नाम से ये पुकारे जाते हैं।’ भगवान् सूर्यदेव को प्रणाम है।
*🌿🌹 शुभप्रभात 🌿🌹*
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