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बसंत पंचमी भारत में हिन्दुओं का प्रसिद्ध त्योहार है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है

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सलीम मंसूरी की रिपोर्ट जमानिया 

जमानियां। बसंत पंचमी भारत में हिन्दुओं का प्रसिद्ध त्योहार है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की प्रतिमा जगह जगह चिन्हित पूजा पंडालों में बैठाई गई। जहां श्रद्धालु पूजा पाठ की भीड़ उमड़ पड़ी। शुक्रवार को पांडेय टोली मोहल्ला, पक्का घाट मोड़, प्रजापति मोहल्ला लोदीपुर, आदि स्थानों पर सरस्वती प्रतिमा बैठाई गई। बताया जाता है। यह पूजा पाठ सम्पूर्ण भारत में बड़े उल्लास के साथ की जाती है। और कीर्तन टोली दिनभर गीत सुनाते है। इस दिन स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती हैं। बसंत पंचमी के पर्व से ही बसंत ऋतु का आगमन होता है। शांत, ठंडी, मंद वायु, कटु शीत का स्थान ले लेती है। तथा सब को नवप्राण व उत्साह से स्पर्श करती है। पत्र पटल तथा पुष्प खिल उठते हैं। स्त्रियाँ पीले-वस्त्र पहन बसंत पंचमी के इस दिन के सौन्दर्य को और भी अधिक बढ़ा देती हैं। लोकप्रिय खेल पतंगबाज़ी बसंत पंचमी से ही जुड़ा है। यह विद्यार्थियों का भी दिन है। इस दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की पूजा आराधना भी की जाती है। बताया जाता है। कि आकाश स्वच्छ है, वायु सुहावनी है, अग्नि (सूर्य) रुचिकर है। तो जल पीयूष के समान सुखदाता और धरती, उसका तो कहना ही क्या वह तो मानो साकार सौंदर्य का दर्शन कराने वाली प्रतीत होती है। ठंड से ठिठुरे विहंग अब उड़ने का बहाना ढूंढते हैं। तो किसान लहलहाती जौ की बालियों और सरसों के फूलों को देखकर नहीं अघाते। धनी जहाँ प्रकृति के नव-सौंदर्य को देखने की लालसा प्रकट करने लगते हैं। तो वहीं निर्धन शिशिर की प्रताड़ना से मुक्त होने पर सुख की अनुभूति करने लगते हैं। सच प्रकृति तो मानो उन्मादी हो जाती है। हो भी क्यों ना पुनर्जन्म जो हो जाता है। श्रावण की पनपी हरियाली शरद के बाद हेमन्त और शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है। तब बसंत उसका सौन्दर्य लौटा देता है। बसंत पर्व का आरंभ बसंत पंचमी से होता है। इसी विद्या की अधिष्ठात्री देवी महासरस्वती का जन्मदिन मनाया जाता है। युवा पुजारी ब्राह्मण उद्धव पाण्डेय ने बताया कि सरस्वती ने अपने चातुर्य से देवों को राक्षसराज कुंभकर्ण से कैसे बचाया। इसकी एक मनोरम कथा वाल्मिकी रामायण के उत्तरकांड में आती है। कहते हैं देवी वर प्राप्त करने के लिए कुंभकर्ण ने दस हज़ार वर्षों तक गोवर्ण में घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा वर देने को तैयार हुए। तो देवों ने कहा कि यह राक्षस पहले से ही है। वर पाने के बाद तो और भी उन्मत्त हो जाएगा। तब ब्रह्मा ने सरस्वती का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि सरस्वती राक्षस की जीभ पर सवार हुईं। सरस्वती के प्रभाव से कुंभकर्ण ने ब्रह्मा से कहा- स्वप्न वर्षाव्यनेकानि। देव देव ममाप्सिनम। यानी मैं कई वर्षों तक सोता रहूँ, यही मेरी इच्छा है।

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