बीते दिनों हिमाचल प्रदेश के मनाली की यात्रा के दौरान एक अनुभव ने यह साफ कर दिया कि पर्यटन स्थलों पर ठगी कोई अपवाद नही, बल्कि एक सुव्यवस्थित तंत्र का हिस्सा बन चुकी है। हम चार लोग थे और ठहरे कुफ़री में। घूमने के उद्देश्य से अगले दिन कुफ़री पहाड़ जाने का कार्यक्रम बना। पास के टैक्सी स्टैंड पर पहुँचे तो वहाँ मौजूद एजेंट ने दो पैकेज बताए एक दो हजार रुपये प्रति व्यक्ति और दूसरा एक हजार रुपये प्रति व्यक्ति। यह राशि केवल लाने-ले जाने की बताई गई, बाकी गतिविधियों का खर्च अलग। हमने एक हजार वाला पैकेज तय किया और चार हजार रुपये अग्रिम दे दिए।जिप्सी आई और हमें गंतव्य तक पहुँचा दिया, लेकिन वहाँ पहुँचते ही अहसास हुआ कि हम ठगे जा चुके हैं। जहाँ हम पहले से खड़े थे, वहाँ से कुल दूरी मुश्किल से दो-तीन किलोमीटर रही होगी, जिसके लिए पूरे चार हजार रुपये वसूल लिए गए। यह अनुभव बेहद खला, लेकिन इससे भी ज्यादा खलने वाली बात यह थी कि यह सब एक सुनियोजित व्यवस्था के तहत हो रहा था।दरअसल, पर्यटन स्थलों पर एक पूरा ‘लूट तंत्र’ सक्रिय रहता है। कुछ टैक्सी चालक कमीशन के लालच में पर्यटकों को एजेंटों और लुटेरों के हवाले कर देते हैं। यही स्थिति नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के आसपास भी देखने को मिलती है, जहाँ खानपान की दुकानों वाले भोले-भाले यात्रियों को बरगलाकर एक चीज़ के पाँच दाम वसूलते हैं। अफ़सोस की बात यह है कि इन सबके बीच स्थानीय पुलिस की भूमिका अक्सर मूकदर्शक या फिर परोक्ष रूप से उन्हीं लुटेरों के पक्ष में दिखाई देती है।कुछ ऐसा ही व्यवहार ट्रैफिक पुलिस के एक हिस्से में भी देखने को मिलता है, जहाँ बाहर के नंबरों वाली गाड़ियों, खासकर व्यवसायिक वाहनों पर गिद्ध दृष्टि रहती है उन्हें रोकना, कोई न कोई कमी निकालना और फिर ‘समझौते’ के नाम पर कमाई करना।इसी पृष्ठभूमि में मुंबई की यह घटना भी देखी जानी चाहिए, जहाँ एक अमेरिकी महिला से एयरपोर्ट से महज़ कुछ सौ मीटर दूर स्थित होटल तक छोड़ने के बदले 18 हजार रुपये वसूल लिए गए। स्थान अलग है, पीड़ित अलग है, लेकिन तरीका वही है पर्यटक, असहाय यात्री और संगठित ठगी। यह सवाल अब सिर्फ टैक्सी ड्राइवरों या एजेंटों तक सीमित नहीं है, बल्कि उस पूरे सिस्टम पर उठता है, जो ऐसी लूट को चुपचाप पनपने देता है।