सलीम मंसूरी की रिपोर्ट
जमानियां। माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते हैं। यह एकादशी बहुत ही पुण्यदायी है। इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति नीच योनि जैसे भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है। बताया जाता है। कि गुरुवार को 29 जनवरी को माघ शुक्ल की एकादशी जया एकादशी का व्रत है। नगर कस्बा सहित दूर दराज के ग्रामीण अंचलों से श्रद्धालु महिलाएं पक्का बलुआ घाट गंगा नदी पहुंचकर श्रद्धा के साथ डुबकी लगाई। इसके साथ आसपास की मंदिरों में पूजा में व्रत कथा का पाठ किया। जया एकादशी का व्रत गुरुवार 29 जनवरी 2026 को संपन्न हुआ। युवा ब्राह्मण पुजारी उद्धव कुमार पांडेय ने बताया कि इस व्रत को करने से हर प्रकार का सुख-सौभाग्य प्राप्त होता है। और रुके कार्य बनने लगते हैं। जया एकादशी का व्रत करने से श्रीहरि की कृपा भी मिलती है। लेकिन व्रत तब तक अधूरा ही माना जाता है। जबकर इससे संबंधित व्रत कथा का पाठ न किया जाएगा। इसलिए पूजा में जया एकादशी की कथा जरूर पढ़ें और फिर सुनें भी। उन्होंने बताया कि जया एकादशी की कथा राजा इंद्र और गंधर्व से जुड़ी है। कथा के अनुसार एक बार इंद्र की सभा में अप्सराएं नृत्य कर रहीं थी। सभा में गंधर्व पुष्पवंत, उसकी लड़की पुष्पवती और चित्रसेन की स्त्री मालिनी और उसका पुत्र माल्यवान भी मौजूद थे। उस समय पुष्पवती माल्यवान को देख मोहित हो गई। और उसके मन में काम भाव जाग उठा। पुष्पावती ने अपने रूप, सौंदर्य, हाव-भाव से माल्यवान को कामासक्त कर दिया। इधर दोनों कामासक्त में लीन हो गए। तब राजा इंद्र ने उन्हें अलग करने के लिए नृत्य करने का आदेश दिया। दोनों नृत्य करने लगे लेकिन कामातुर होने के कारण वे सही से नृत्य नहीं कर पा रहे थे। इसके बाद देवराज इंद्र गंधर्व माल्यवान और पुष्पवती ने नाराज हो गए। इंद्र ने दोनों को पिशाच बनने का श्राप दिया। श्राप के बाद दोनों मृत्यु लोक पहुंच गए। और फिर पिशाच योनि में आकर पृथ्वी पर भटकने लगे। पांडेय ने बताया कि वर्षों भटकने के बाद गंधर्व को एक ऋषि मिले। गंधर्व और पुष्पवती ने उस ऋषि से पिशाच योनि से मुक्ति का उपाय पूछा। ऋषि ने दोनों को माघ शुक्ल की जया एकादशी करने का उपाय बताया। इसके बाद गंधर्व और पुष्पवती ने विधि-विधान से जया एकादशी का व्रत किया। और व्रत के पुण्य फल से उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई।इसलिए ऐसा माना जाता है। कि जो व्यक्ति विधिपूर्वक इस व्रत को करता है। इस पावन कथा का पाठ करता है। और एकादशी व्रत के नियमों का पालन करता है। वह सभी प्रकार के सुखों का भोग कर बैकुंठ लोक में स्थान पाता है।