पूजा भारद्वाज की रिपोर्ट वाराणसी, वर्तमान में कल्कि भगवान की आध्यात्मिक चेतना जागृत है और सांसारियों की चेतना का उद्धार कार्य चल रहा है। भगवान कल्कि की चेतना 1 अप्रैल 2025 से पूर्व जागृत है। सांसारियों की चेतना का उनसे जुड़ाव का कार्य ढाई वर्ष तक चलेगा। सनातियों की चेतना का जुड़ाव का कार्य मुख्यतः डेढ़ वर्ष अर्थात 30 सितंबर 2026 तक और उसके बाद गैर सनाततियो की चेतना की चेतना का कल्कि भगवान से जुड़ाव कार्य चलेगा। यह भी ज्ञातव्य हो की वर्तमान में कलयुग या दैत्य युग समाप्त होकर आदित्य युग चल रहा है आदित्य युग पुर्ण होने के बाद सतयुग शुरू होगा।
मुख्य बिन्दु-
ईश्वर समदर्शी है और सनातन समाज के हर वर्ग के लिए व्यवस्था बनाई गई है वर्तमान में आदित्य योग में यादवों एवं अन्य चंद्रवंशी क्षत्रियों जैसे कुर्मी,पटेल,कोयरी, कुशवाहा,कहांर,रामानी,रेड्डी कायस्थ आदि के लिए रामपथ और सूर्यवंशी क्षत्रियों राजपूतो के लिए कृष्णपथ निर्धारित है। इसमें तनिक भी भ्रम नहीं होना चाहिए। ईश्वर एक है। सभी भगवान विष्णु के अलग-अलग रूप है भीड़ अधिक होने पर मंदिरों में भी अलग-अलग द्वारा बनाए जाते हैं। रेलवे स्टेशन पर अलग-अलग प्लेटफार्म बनाए जाते हैं।
इस व्यवस्था को अव्यवस्थित करने का प्रयास किया जा रहा है, हेरा फेरी की कोशिश हो रही है।वर्तमान आध्यात्मिक व्यवस्था केवल मुखौटा बनकर रह गई है। उनके होने का कोई औचित्य नहीं है। वैष्णव और शैव दोनों पंथ के धर्मगुरु उद्धार के सहायक नहीं अपीतु बाधक बन गये हैं। ये
अतिशयोक्ति नहीं अल्पोक्ति है। क्योंकि उन्होंने दुषीत परंपरा को न केवल अपना लिया है अपितु समाज में प्रसारित भी कर रहे हैं।
इस व्यवस्था को फैलाने और कायम रखने में मुख्य भूमिका कृपाचार्य की है। कृपाचार्य कलयुग के चिरंजीवी थे गुरु शुक्राचार्य की गद्दी पर थे।देवगुरु बृहस्पति की गद्दी पर मार्कंडेय ऋषि है। द्रोणाचार्य अधर्म के साथ थे और इस पक्ष से अंत हुआ भगवान श्री कृष्णा उन्हें गुरु और पिता दोनों रूप में विफल बताया फिर उन्हे कलयुग के गुरु कैसे मान लिया गया।
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यादवों को क्रिष्ण पथ पर चलने का आह्वान किया जा रहा है जो द्वापर की व्यवस्था थी और राजपूतों को रामपथ पर चलने का जोर दिया जा रहा है जो त्रेता की व्यवस्था थी। इस असामाजिक व्यवस्था पर चलने का परिणाम परिलक्षित होगा।
भीड़ में भागदड़, उन्माद,अनावश्यक कलह, कलेश और रोग युद्ध और अकाल मृत्यु।
उपरोक्त समसामयिक व्यवस्था प्रमाण:
राजपूतों के श्री कृष्ण:
1.भगवान श्री कृष्ण के बैकुंठ आगमन के बाद का शेष शरीर पश्चिमी तट से पूर्वी तट उड़ीसा में आ गया पुरी के राजा सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।
2. मथुरा से चलकर भगवान जयपुर में गोविंद देव ग्रुप में विराजमान है।
3. मथुरा से भगवान के अन्य रूप विजयपुर/उदयपुर जाकर श्रीनाथजी के रूप में विराजमान है।
4. आदिकाल से भगवान अजमेर।अजमेरु में यानी पुष्कर में ब्रह्रूप में है।
यादवों के श्रीराम
भगवान बलराम मित्तल युद्ध पहलवानी में सिद्ध हस्त थे कलयुग के यादव उन्हीं का वंशज जैन है संस्कृत द्वापर के अंत में भगवान कृष्ण लगभग अपने सारे संघीयों के साथ सरीर त्याग कर दिया था।
2. (मुलायम को मल्लायम पढ़ा जा सकता है) यादवों के राम कहने से बलराम कलयुग के परशुराम और वर्तमान के जय श्री राम का भी लाभ मिलेगा। द्वापर में बलराम जी का युद्ध बानासुर।कर्तवीर्य अर्जुन से हुआ था।भगवान परशुराम के साथ इसी का युद्ध त्रेता में हुआ था।वर्तमान में यादवों का उद्धार परशुराम पीठ से ही होगा।
जनता से अपील
1.तुलसी का किसी भी रूप में सेवन बनाकर दे तुलसी पहले वृन्दा थी। वृंदा असुर राज जालंधर की पत्नी थी ना कि विष्णु की पत्नी थी। कलयुग की समाप्ति पर कल की और सूरदास की निंदा विवाह वैष्णो देवी से होगा बाकी तुलसी से बिंदा ने पहले पार्वती के हरण के लिए जालंधर का असफल सहयोग और संरक्षण किया तथा कलयुग में घरों से मिलकर वैष्णो देवी को तंग किया है।
2. वृंदावन भारद्वाज कौशिक और सर व गोत्री ब्राह्मणों के लिए निर्धारित है अन्य सनातनी वहां जाकर अपनी उर्जा बर्बाद ना करें।
3. विशु जग के लिए वैजयंती माला या करमाला का प्रयोग करें या अप अल विशेषता स्थान गौरी संप्रदाय तथा अन्य बातों समुदाय से है।
4. भगवान शिव पर कोई भी विषैली वस्तु फूल-फल या जीव अर्पित ना करें जैसे मदार धतूरा कोबरा गेहूअन आदि।
5. ब्रह्मा जी को सरस्वती का पति माने ना कि पिता ब्रह्मा जी सरस्वती के मूर्तिकार थे उनमें प्राण आदिशक्ति का है ना कि ब्रह्मा डॉक्टर सुनील कुमार