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साम्प्रदायिक उकसावे और देशविरोधी बयानबाज़ी की मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने की कड़ी निंदा

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                                               साम्प्रदायिक                                     उकसावे और देश विरोधी बयानबाज़ी की मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने की कड़ी निंदा

राव मुशर्रफ अली पुंडीर, संयोजक, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच मेरठ प्रांत मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मेरठ प्रांत संयोजक राव मुशर्रफ अली पुंडीर ने मौलाना महमूद मदनी द्वारा दिए गए ताज़ा बयानों की कड़े शब्दों में  करते हुए कहा कि ऐसे बयान देश की एकता, सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर रूप से हानिकारक हैं।राव मुशर्रफ ने कहा कि भारत का एक जिम्मेदार नागरिक और मुस्लिम समाज का प्रतिनिधि होने के नाते मैं उन सभी वक्तव्यों की निंदा करता हूँ, जिनमें देश के मुसलमानों को भड़काने, उकसाने या “जिहाद” जैसे कट्टरपंथी शब्दों का प्रयोग करने की कोशिश की गई है। उन्होंने कहा कि इस्लाम धर्म नफ़रत, हिंसा और सामाजिक विद्वेष फैलाने की अनुमति नहीं देता। मौलानाओं का कार्य समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं।उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत का मुस्लिम समाज शांति, कानून, संविधान और भाईचारे में पूरा विश्वास रखता है, और किसी भी प्रकार की नफ़रत, उकसावे या कट्टरता का समर्थन नहीं करता।वंदे मातरम्” पर विवाद — संविधान का अपमान बताया राव मुशर्रफ ने कहा:वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रीय गीत है। इसकी निंदा या इसका विरोध कर मुसलमानों को भड़काना हमारे संविधान, राष्ट्रीय मूल्यों और स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष का अपमान हैउन्होंने कहा कि भारतीय मुस्लिम हमेशा भारत माता के सम्मान,संविधान की गरिमा,हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारेके साथ खड़े हैं और हमेशा खड़े रहेंगे।पूरे समुदाय को बदनाम करने का प्रयास अस्वीकार्य राव मुशर्रफ ने कहा कि कुछ व्यक्तियों के उकसाऊ बयान पूरे मुस्लिम समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते। इस तरह की बयानबाज़ी देश का माहौल खराब करने की कोशिश है, जिसकी वे कड़े शब्दों में निंदा करते हैं।सरकार से कार्रवाई की मांगउन्होंने भारत सरकार और प्रशासन से आग्रह किया कि ऐसे भड़काऊ बयानों का संज्ञान लेकर आवश्यक कार्रवाई की जाए, ताकि देश में शांति, सौहार्द और कानून-व्यवस्था बनी रहे।न्यायिक प्रणाली पर सवाल उठाना देश के ढांचे पर हमला राव मुशर्रफ ने कहा कि भारत की न्याय प्रणाली बिना किसी पक्षपात के सत्य के साथ न्याय करती है। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया को राजनीतिक दबाव से जोड़कर प्रस्तुत करना, देश के बुनियादी ढांचे पर हमला करने जैसा है। इससे अराजकता फैलती है और तुष्टिकरण की राजनीति के माध्यम से देश में भेदभाव की भावना पैदा करने का प्रयास किया जाता है, जो पूरी तरह गलत है।

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