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हजरत जाफर-ए-सादिक (र.) (छठे इमाम) के नाम से ‘कुंडे की नियाज़’ के रूप में पकवान बनाकर नियाज़ कराकर लोगों में पकवान खिलाया

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सलीम मंसूरी की रिपोर्ट जमानिया 

जमानियां। कस्बा बाजार मोहल्ला चौधरी। निवासी मरहूम सईद मंसूरी पुत्र नेहाल शेख मंसूरी मकान पर सोमवार की अल सुबह हजरत जाफर-ए-सादिक (र.) (छठे इमाम) के नाम से ‘कुंडे की नियाज़’ के रूप में पकवान बनाकर नियाज़ ( फातिहा ) कराया गया। यह सिलसिला वर्षो से चला आ रहा है। बताया जाता है। कि घर के महिलाएं साफ पाक होकर तथा उस स्थान को साफ सफाई करने के बाद लगभग 3 बजे भोर में पकवान के रूप में खीर पुड़ी बनाती है। उसके किसी आलिम को बुलवाकर हजरत जाफर ए सादिक के नाम से नियाज़ ( फातिया) कराती हुई। जिसको आसपास के लोगों को तबर्रुख के रूप में खिलाती है। खासकर 22 रजब के दिन, जिसे कुछ लोग उनके मक़ाम-ए-गौसियत-ए-कुबरा मिलने के दिन के तौर पर मनाते हैं। यह एक धार्मिक परंपरा है। जिसमें पकवान (जैसे चावल, खीर, या अन्य मिठाई) बनाकर गरीबों और जरूरतमंदों में बांटा या खिलाया जाता है। जो उनकी शान और इल्म (ज्ञान) की याद दिलाता है। जैसा कि नूरी मस्जिद के इमाम असरफ करीम कादरी, मौलाना महमूद एवं शाही जामा मस्जिद के सेकेट्री मौलाना तनवीर रजा ने अपने अपने तकरीरों में बताया कि हजरत इमाम जाफर-ए-सादिक (अलैहिस्सलाम) 22 रजब (इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार) उनके नाम से पकवान (जैसे कुंडे ) बनाकर नियाज़ कराया जाता है। जिसमें मीठी पूरी, खीर इत्यादि बनाकर आसपास के लोगों को खिलाया जाता है। यह परंपरा उनके इल्म, शहादत, और अल्लाह द्वारा उन्हें दिए गए मकाम (पद) के सम्मान में की जाती है। यह सिलसिला सुन्नी और शिया दोनों समुदायों में अलग-अलग तरीकों और मान्यताओं के साथ प्रचलित है। लेकिन मूल रूप से यह बुजुर्गों (औलिया और इमामों) के सम्मान और ईसाल-ए-सवाब (आत्मा के लिए दुआ) का एक तरीका है। जिसे कुंडे की नियाज़ की हकीकत हम कुंडो की नियाज़ हज़रत इमाम जाफर सादिक़ के नाम पर नियाज़ कराते है। उन्होंने बताया कि आप की इबादतों रियाज़त यह है। कि हज़रत सय्यदना इमाम जाफ़र सादिक़ रदियल्लाहु अन्हु आप ज़ुहदो तक़वा शिआरी नीज़ रियाज़त व मुजाहिदात और इबादत गुज़ारी में मशहूर थे। नूरी मस्जिद के इमाम असरफ करीम कादरी का बयान हैं। कि एक ज़माने तक में आप की खिदमत में आता रहा। मगर मैने हमेशा आप को तीन इबादतों में से एक में मसरूफ पाया। या तो आप नमाज़ पढ़ते हुए। मिलते या तिलावत में मशगूल होते या रोज़ादार होते। तनवीर रजा ने बताया कि आप बिला वुज़ू कभी हदीस शरीफ की रिवायत नहीं फरमाते थे। रजा ने फरमाया कि आप मुस्तजाबुद दावात थे। जिस की दुआ क़बूल होती हो हज़रत सय्यदना इमाम जाफ़र सादिक़ रदियल्लाहु अन्हु इस दर्जा मुस्तजाबुद दावात व कसीरुल करामात थे। कि जब आप को किसी चीज़ की ज़रुरत महसूस होती। तो आप हाथ उठा कर दुआ करते की ए मेरे रब मुझे फुलां चीज़ की ज़रूत है। आप की दुआ ख़त्म होने से पहले ही वो चीज़ आप के पहलू में मौजूद हो जाती। नूरी मस्जिद के इमाम असरफ करीम कादरी ने तकरीर में बताया कि चुनाचे अबुल कासिम तबरी इबने वहब से नकल करते हैं। कि मैंने लैस बिन सअद रहमतुल्लाह अलैह को फरमाते सुना के में 113 हिजरी में हज के लिए पैदल चलता हुआ। मक्का मुकर्रमा ज़ादा हल्ल्लाहु शरफऊं व ताज़ीमा पहुंचा। आलिमों ने बताया कि असर की नमाज़ के वक़्त जबले अबू कबीस पर पहुंचा। तो वहां एक बुजुर्ग को देखा कि बैठे हुए दुआएं मांग रहें हैं।

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