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मोहर्रम के महीने में तीसरे दिन निकलने वाले मातम और अखाड़े का जुलूस इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद में शोक और अकीदत का हिस्सा है। 

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सलीम मंसूरी की रिपोर्ट                                जमानियां। नगर कस्बा बाजार में मोहर्रम के महीने में तीसरे दिन निकलने वाले मातम और अखाड़े का जुलूस इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद में शोक और अकीदत का हिस्सा होता है। इस मौके पर अखाड़ों में पारंपरिक करतब दिखाए जाते हैं। और नौहाख्वानी के साथ या हुसैन की सदाएं गूंजती हैं। मोहर्रम के तीसरे दिन के जुलूस और अखाड़े में मातम और नौहा के साथ इमाम हुसैन की शहादत की याद में अजादार (शोक मनाने वाले) सीने पर हाथ रखकर मातम करते हैं। और कर्बला की घटनाओं का जिक्र करने वाले नौहे पढ़ते है। पारंपरिक अखाड़ा जुलूस में शामिल लोग लाठी से करतब दिखाते है। पारंपरिक लाठी का बेहतरीन प्रदर्शन करते है। यह कला 50.60 पीढ़ियों से चली आ रही एक विरासत है। कर्बला के मैदान में हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों द्वारा ज़ुल्म के खिलाफ दी गई कुर्बानी को याद दिलाता है। बताया जा रहा है। की मोहर्रम के तीसरे दिन (तीसरी) का मातम जुलूस अखाड़ा हजरत इमाम हुसैन (A.S.) और कर्बला के शहीदों की शहादत की याद में निकाला गया। जुलूस अखाड़े के हुनरमंद लाठी से करतब दिखाते रहे। और बीच बीच में या इमाम या हुसैन की सदाओं के साथ गम का इजहार करते हैं। मोहर्रम के तीसरी के इस मौके पर परंपराओं के अनुसार मातम और जुलूस के साथ अखाड़े में शामिल सैकड़ों मुस्लिम बंधुओं ने सीना ज़नी करके और नोहा (मातम के गीत) पढ़कर इमाम हुसैन के बलिदान को याद किया। हाफिज तौहीद रजा ने बताया कि कर्बला की याद जुल्म के खिलाफ सच की लड़ाई का प्रतीक है। अखाड़े के खलीफा निशात खान वारसी, अमन खान गांधी और नौजवान पारंपरिक लाठी के साथ अपने शानदार करतब दिखाते हैं। जो 50.60 पहले से पीढ़ियों से चली आ रही संस्कृति का हिस्सा है। मोहर्रम और कर्बला के इतिहास के बारे में शाही जामा मस्जिद के सेकेट्री मौलाना तनवीर रजा ने विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मोहर्रम पर हजरत इमाम हसन हुसैन की शहादत पर इस अखाड़े को खेला जाता है। इसमें बच्चे, बड़े, बुजुर्ग अखाड़ा खेलते हैं। अखाड़ा किसी को सिखाया नहीं जाता है। ये खुद बच्चे बचपन से खेलना सीखते हैं और वह बड़े होकर इसमें महारत हासिल कर लेते हैं। रजा ने बताया कि करीब 50.60 साल से यहां ताजिए बनाए जाते हैं। मोहर्रम पर हजरत इमाम हसन हुसैन की कुर्बानी पर यह अखाड़ा खेला जाता है। उन्होंने कहा कि मोहर्रम में जो ताजिए बनाए जाते हैं। वह भी उनकी याद में बनाए जाते हैं। उसके बाद बच्चे, बड़े और बुजुर्ग इसमें अखाड़ा खेलते हैं। बताया जाता है। की अखाड़ा खेलने के दौरान ढाल, लाठी, डंडों के साथ देखने को मिलती हैं। जिससे लोग अखाड़ा खेलते हैं। अखाड़ा देखने के लिए काफी संख्या में लोगों की भीड़ रहती है। जिसमें बच्चे, बड़े, बुजुर्ग और महिलाएं शामिल रहती हैं। नूरी मस्जिद लोदीपुर के इमाम अशरफ करीम कादरी ने बताया कि जमानियां में ताजेदारी की प्रथा 50.60 सालों से चली आ रही है। मोहर्रम पर लोग अखाड़ा खेलते हैं। हजरत इमाम हसन हुसैन की शहादत पर जुलूस और अखाड़े में लाठी के माध्यम से करतब दिखाते हुए खेला जाता है। इसमें बच्चे, बड़े, बुजुर्ग अखाड़ा खेलते हैं। अखाड़ा किसी को सिखाया नहीं जाता है। खुद बच्चे बचपन से खेलना सीखते हैं। और वह बड़े होकर इसमें महारत हासिल कर लेते हैं। इस दौरान अखाड़े के खिलाफ लाठी से करतब दिखाने वाले को समझाया करते रहते है। ताकि किसी को चोट ना आ जाए। हाजी एडवोकेट इमरान नियाजी का कहना है। की मोहर्रम के दौरान पैगंबर हज़रत मुहम्मद के नवासे, हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों की कर्बला के मैदान में हुई शहादत की याद में ग़म और मातम का इज़हार किया जाता है। यह कोई ख़ुशी का त्योहार नहीं, बल्कि उनके बलिदान को याद कर अश्क बहाने और शोक मनाने का समय है। उन्होंने कहा कि

मातम और शोक मनाने की परंपराएं सदियों से चली आ रही है। जहाँ कर्बला की घटनाओं को याद कर ज़िक्र किया जाता है और पैगंबर के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की जाती है। और ताज़िया और जुलूस इमाम हुसैन की याद में ताज़िये (मकबरे की प्रतिकृतियां) निकाले जाते हैं। और सड़कों पर मातम किया जाता है।

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