आजकल हर चट्टी-चौराहे पर सैलून के नाम पर ‘जेंट्स पार्लर’ और फलनवा-ढेकनवा ‘बार्बर शॉप’ खुल गए हैं, जहाँ बाल के साथ जेब पर भी कैंची चलती ह।
मेरे बचपन में अगर अम्मा बाल कटवाने ले जातीं तो हज्जाम से कहतीं “बंगला कट काट दिहा।” उस वक्त तक ‘सैलून’ नाम की चिड़िया से हमारा कोई वास्ता नहीं पड़ा था। बस सड़क किनारे, ज़मीन पर हज्जाम हमें ईंट पर बिठा देता और खाच-खुच करके चाहे जैसे हमारी हजामत बना देता। मतलब बचपन में बाल कटवाते वक्त हमारी कोई पसंद नहीं होती थी। उस समय हमारी कोई हेयर-स्टाइल नहीं होती थी… बस जैसे हार्वेस्टर मशीन धान की कटाई करती है, ठीक उसी तरह हमारे बाल काटे जाते थे। मतलब नाई बस गंजा नहीं करता था, ताकि हमारे बाल कह सकें बाल-बाल बचे।समय बदला। जब हम “वयस्क नर” की श्रेणी में आए तो सोचा कि अब बाल ‘लाबेला’ टाइप के सैलूनों में कटवाए जाएँ। तब हम तस्वीरों में दिखने वाले ऐसे ही सैलूनों में जाने लगे, जहाँ मिथुन, गोविंदा, अमिताभ, सुमति सहगल, रमेश भदावन टाइप हीरो के पोस्टर लगे होते थे। वहाँ इंतज़ार काटने के लिए माया, स्टारडस्ट, मनोहर कहानियाँ टाइप की मैगज़ीनें पड़ी रहती थीं। जो वेटिंग में होता, वह इन पत्रिकाओं को आँखों से चाटता रहता था।बाल कटवाने की बारी आई तो कुछ देर हज्जाम दिमाग भी चाटता था। अगर वह आपको व्यक्तिगत रूप से जानता होता तो मोहल्ले की पूरी कुंडली खोल देता किसकी सेटिंग किससे है, किसके घर क्या पका है, किसकी लड़की भागकर ब्याह कर ली, किसके घर बँटवारे की खींचतान चल रही है। वह महाभारत के संजय की तरह आँखों देखा हाल सुनाता था, हालाँकि सच्चाई का स्तर 50-50 रहता था। इससे फुर्सत मिली तो किसको रास्ते में जिन्न-भूत मिला, किसके खेत से गड़ा धन निकला यह सब भी सुनाया जाता था।और हाँ, एक ही शेविंग क्रीम और एक ही उस्तरे से सबकी दाढ़ी-बाल बनते थे।उस सैलून में एक टेपरिकॉर्डर भी रहता था, जिसके कैसेट में ‘दलाल’ फिल्म का “अटरिया पर लोटन कबूतर” और “सइयाँ के साथ मड़इया में… बड़ा मज़ा आवे रजईया में” टाइप के गाने उस्तरे से भी ज़्यादा ज़रूरी होते थे।उस समय 10 से 20 रुपये में दाढ़ी-बाल सब बन जाता था। और आज के सैलूनों यानी जेंट्स पार्लरों में घुसिए तो पहला सवाल होता है कौन-सा क्रीम लगाएँ नॉर्मल या डेनिम फोम कटिंग-शेविंग के बाद मसाज कर दें ब्लीच कर दें।यानी जेंट्स पार्लर में आए हैं तो किसी न किसी तरीके से जेब तो ढीली करनी ही पड़ेगी।इसीलिए हम जैसे लोग बढ़े बाल और दाढ़ी के साथ मजबूरन ‘बौद्धिक’ श्रेणी में दिखने को अभिशप्त हो जाते हैं।वरना क्या पचास की उम्र होती है खिचड़ी दाढ़ी के साथ अर्ध-बूढ़ा दिखने की।