गोंडों की देव भुमि कोयली कचारगढ मे अपने सगा किस तरह से अपने ऋति रिवाज और परंपराओं से जुङे हैं. अपने शादी -विवाह मे संस्कार की सारी रस्म परिवार और रिस्तेदार ही करते हैं,कोई बाहरी आदमी संस्कार करने नहीं आता है.यहां दहेज लेने की कोई परंपरा नही है. परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाने पर उसे मिट्टी दी जाती है.सिर दक्षिण दिशा मे और पैर उत्तर की तरफ रखते हैं.जिस दिन मृत्यु होती है उसी दिन मिट्टी देकर सगाजनों को भोजन कराते हैं.यदि मृत्यु शाम मे होती है तो दुसरे दिन शुवह मिट्टी देते हैं और सगाजनों को भोजन कराते हैं. भोजन कराने से पहले आंगन मे या घर के बाहर भंडार खोदते हैं,यानि गड्ढा खोदते हैं जिसमें भोजन के बाद पत्तल डाल देते हैं और हाथ भी उसी भंडारे मे धोते हैं. इस कार्य मे कोई बाहरी नही होता और न कोई पूजा पाठ.मृत्यु कभी भी हो,पेनकरण (देव मिलान)मार्च के महीने मे ही करते हैं. होली और दिवारी त्योहार भी मनाते हैं जिसमे भोजन बना कर अपने देव की पूजा करते हैं.अपने पूजा घर को भीतर घर कहते हैं,जो उत्तर पूर्व की दिशा मे होता है.यह पवित्र स्थान होता है,इसमे किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है.भीतर घर मे जमीन पर दो ऊंचे चौकोर टिला बना होता है जहां दो दीपक जलाए जाते हैं.उपर दो मटकों मे देव स्थापित रहते हैं,यहां कोई फोटो या मुर्ती नही होती. इस तरह गोंडों के संस्कार पूरी तरह से शुद्ध और संक्रमण रहित होता है. सेवा जोहार