विजय कुमार प्रजापति की रिपोर्ट वाराणसी
वाराणसी। (काशी) नगरी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है जहाँ काशी के प्रत्येक कण-कण में शिव के अनंत रूपों की पूजा होती है। इसी परंपरा के अनुरूप वाराणसी के दक्षिण झोर पर भदैनी मुहल्ला में स्थित भद्रेश्वर महादेव मंदिर स्थानीय जनमानस में अत्यंत श्रद्धा-भाव से पूजित है
धार्मिक और पौराणिक महत्व
भद्रेश्वर महादेव मंदिर में विराजमान शम्भू बाबा/भद्रेश्वर महादेव को नगरवासी और आसपास के क्षेत्र के श्रद्धालु सबका कल्याणकर्ता मानते हैं। मंदिर के महंत डॉ. श्रवण दास जी महाराज के अनुसार यह शिवलिंग स्वयंभू (प्रकृति द्वारा स्वयं उत्पन्न) है और हर भक्त पर अपनी कृपा दृष्टि सदैव बनाए रखते हैं
स्थानीय मान्यता के अनुसार, लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व यह क्षेत्र घने जंगल — भद्रवनी — से घिरा हुआ था। उस समय गाय चराने आये ग्वालों ने देखा कि एक गाय लगातार एक ही स्थान पर दूध गिरा रही थी। जब लोगों ने खुदाई की तो वहाँ से शिवलिंग प्राप्त हुआ। चूँकि यह शिवलिंग भद्रवनी नामक जंगल में मिला, इसलिए इसका नाम भद्रेश्वर पड़ा और तब से यह स्थल श्रद्धालुओं के लिए पूजास्थल बन गया। काशी की पुरातन शास्त्रीय परंपरा के अनुसार शिव की नगरी में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से शिव की उपस्थिति अनन्त मानी जाती है। ख़ासकर स्वयंभू लिंगों को अत्यंत पवित्र माना जाता है, क्योंकि वे स्वभाविक रूप से प्रकृति की ऊर्जा से उत्पन्न माने जाते हैं।
स्थानीय इतिहास और परंपरा
स्थानिक परंपरा में कहा जाता है कि यह मंदिर आज से सैकड़ों साल पहले स्थापित हुआ था, जब यह क्षेत्र घने वन में तब्दील था और बाद में ग्रामीणों द्वारा पूजा-आराधना की परंपरा शुरू हुई। यह मंदिर स्थानीय शिवभक्तों के लिए उनकी आस्था, विश्वास और जीवन के कठिन समय में आश्वासन का प्रतीक है। आज भी शिव भक्त यहाँ प्रतिदिन पूजा-अर्चना, रुद्राभिषेक तथा विशेष शिवरात्रि एवं श्रावण के दिनों में विशाल उत्सवों के लिए आते हैं।
लोलार्क कुंड सहित काशी के कई धार्मिक स्थलों को लेकर चर्चा होती रहती है। भदैनी मुहल्ला में स्थित भद्रेश्वर महादेव मंदिर धार्मिक आस्था और स्थानीय परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है, जहाँ भगवान शिव की असीम कृपा तथा भक्तों की श्रद्धा सदियों से जुड़ी हुई है।