अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर सामाजिक विज्ञान संकाय के महिला अध्ययन एवं विकास केंद् में दिनांक 10 मार्च को ‘न्याय और स्त्री: भारतीय संदर्भ” विषय पर एक दिवसीय परिसंवाद का आयोजन किया गया । कार्यक्रम का शुभारंभ महामना पंडित मदन मोहन मालवीय को पुष्पांजलि अर्पण और कुलगीत गायन से हुआ । स्वागत वक्तव्य केंद्र के समन्वयक प्रो. आशीष त्रिपाठी ने दिया । उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता, लोकतंत्र और बंधुत्व पर न्याय टिका है, न्याय परिवार, समाज और अर्थतंत्र में भी मौजूद हो सकता है । न्याय मौलिक और मूलभूत है इसके बगैर समाज में कुछ नहीं पाया जा सकता । कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. अखिलेंद्र कुमार पांडे ने बताया कि न्याय एक अनुभूति और संतुष्टि का विषय है । न्याय की अवधारणा गत्यात्मक रही है, समता और स्वतंत्रता मिलाकर भी न्याय प्राप्ति के प्रयास होते रहे हैं । उन्होंने महिलाओं के दमन के स्वरूप जिनमें शोषण, हाशियाकरण, सांस्कृतिक उपनिवेशवाद और हिंसा को परिभाषित करते हुए राज्य को न्याय के प्रति सजग होने की वकालत की । उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्रों में महिलाओं के न्यूनतम भागीदारी को भी अन्यायपूर्ण कहा । कार्यक्रम की दूसरी वक्ता प्रो. बीभा त्रिपाठी ने अपने व्यक्तिगत जीवन में विभिन्न कार्यस्थलों पर स्त्री के उपेक्षा के अनुभवों को साझा किया । वे कहती है कि कार्यस्थल पर प्रताड़ना उतना दुःख नहीं देता जितना ये न्याय के विधान न्याय में देरी से दुःख देते है ।समाज की नैतिकता और संविधान की नैतिकता में बहुत अंतर है और संविधान की शुरुआत अपने घर से करनी होगी । आधी आबादी को न्यायपालिका में आधे बेंच का अधिकार मिलना चाहिए । हर स्त्री कम से कम एक यात्रा तय करती है संतोष से विद्रोह की ओर या विद्रोह से संतोष की ओर, और इस यात्रा का पड़ाव अवसाद कुंठा भरा होता है ।उन्होंने लैंगिक अपराध के संबंध में एक बेहतर शब्दावली के प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया । कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रो. चंद्रकला पाड़िया ने बताया कि किस तरह पश्चिमी दर्शन में रूसो और हेगल महिलाओं को अक्षम मानकर उनकी पवित्रता पर पुरुषवादी नियंत्रण स्थापित करते हैं । उन्होंने बताया कि महिलाओं के साथ दार्शनिक स्तर से लेकर सामाजिक और ऐतिहासिक स्तर पर हमेशा भेदभाव हुआ है । उन्होंने बताया कि ये तर्क आज भी प्रभावी है कि पुरुष द्वारा देखा गया ही शाश्वत है जबकि स्त्री की दृष्टि शाश्वत नहीं मानी जाती क्योंकि पुरुष के पास कारण है और स्त्री के पास भावनाएं हैं यानि ज्ञान कारण से मिलता है । न्याय पुरुष तय करता है और नैतिकता स्त्री तय करती है । विभिन्न भारतीय प्राचीन ग्रंथों के सारगर्भित संदर्भों से उन्होंने बताया कि पश्चिमी उपनिवेशवाद ने भारतीय इतिहास में स्त्री की दशा का गलत आंकलन और दुष्प्रचार किया है । इसी पुरुषवादी औपनिवेशिक निगाह की मानसिकता से मुक्ति ही स्त्री जीवन में न्याय की प्रीति का रास्ता है ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सामाजिक विज्ञान संकाय प्रमुख प्रो. अशोक कुमार उपाध्याय ने की । अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने बताया कि महिला उत्थान का पहली सीढ़ी स्वयं महिलाएं बन सकती है क्योंकि वो भविष्य की पीढ़ी का प्राथमिक शिक्षालय हैं । नारीवाद पुरुष बनाम स्त्री का संघर्ष नहीं है । हमें सोचना होगा कि पितृसत्ता की जड़ें कैसे और कहां तक गहरी जमी है तब जाकर उससे मुक्ति संभव है ।
कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन केंद्र की आचार्या डॉक्टर मीनाक्षी झा ने दिया । कार्यक्रम का संचालन डॉक्टर बागीशा सुमन ने किया । इस दौरान सभागार में प्रो बिन्दा परांजपे, प्रो अनुराधा सिंह, प्रो किंगसन सिंह, डॉक्टर किसलय सिंह, डॉक्टर अरुणा कुमारी आदि सम्मानित सदस्य उपस्थित रहें ।