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अस्सी क्षेत्र स्थित श्री काशीधर्मपीठ, रामेश्वर मठ प्रांगण में चल रहे श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ सप्ताह के अवसर

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वाराणसी। अस्सी क्षेत्र स्थित श्री काशीधर्मपीठ, रामेश्वर मठ प्रांगण में चल रहे श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ सप्ताह के अवस पर पूज्यपाद अनंतश्री विभूषित श्री काशीधर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ जी महाराज ने बताया कि भागवत धर्म विवाह, राजकाज, धर्म, अर्थ, काम का विरोधी नहीं है। भगवान श्री कृष्ण के अनेक पटरानियों का वर्णन किया गया है। अपने धर्म रक्षा का कार्य करते हुए भगवान श्री कृष्ण निःसाधन के घर में जाना और उसे आनंद देना ये भगवान का स्वभाव है। महापुरुष वसुदेव ने निःसाधन के घर में भगवान को पहुँचा दिया। यशोदा मैया सो रही थी। भगवान कुब्जा का भी उद्धार करते हैं, ये भगवान की कृपा है।

पूज्य शंकराचार्य जी के कहा कि भगवान श्री कृष्ण की जो सहृदयता है वह भूलने योग्य नहीं है। कुब्जा जो भगवान से विमुख है और कंश के सम्मुख है, उसपर भी भगवान अपनी कृपा किये। भगवान ने रुक्मिणी का हरण करके अपना बना लिया, कोई जीव अगर ईश्वर का वरण करना चाहे तो वरण कर सकता है।

प्रीत रस का उद्दीपन क्या है ? प्रेम रस का अवलम्बन विभाव प्रेम ही है। जब हमको मालूम पड़ता है कि सामने से प्रेम आ रहा है तो हमारे हृदय में प्रेम उदय होता है। अगर भगवान के प्रति प्रेम है तो भगवान को भी सगुण साकार होकर आना पड़ेगा। तभी भगवान प्रेम के वश होकर के लीला करते हैं। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण है भगवान ने उसकी भी दरिद्रता मिटा दिया और सदा-सदा के लिए भक्ति का वरदान दे दिया। सुदामा के सिर में पंगड़ी नहीं कोई वस्त्र नहीं, पाव में जुते नहीं, वह तो केवल इतना जानना चाहता है कि उसका मित्र श्री कृष्ण कहाँ रहता, कैसा है! किसी भी मजहब में ऐसा ईश्वर नहीं है जो करुणा की मूर्ति हो दया की मूर्ति हो और ईश्वर भी हो। सुदामा को श्री कृष्ण ने हृदय से लगाया। भागवत यह बताना चाहता है कि सुदामा से मिलकर श्री कृष्ण परमानंद में डूब गए प्रेम की अश्रुधारा बहने लगी। जो वैभवशाली लोग हैं उन्हें गरीबो का सेवा करना चाहिए, मित्रो का ध्यान देना चाहिए अपने आश्रित जनों का ध्यान देना चाहिए। सुदामा जी कहते हैं कहा मैं दरिद्र कहा श्री कृष्ण। भगवान ने उन्हें अपने पलंग पर सुलाया, सुदामा कहते हैं की कृष्ण ने कृपा करके हमें कुछ नहीं दिया। क्योंकि वैभव भजन के मार्ग में बाधा बन जाता। जहां प्रेम होता है वहा बिना मांगे मिल गया। भगवान श्री कृष्ण खेती करने वाले के पक्षपाती, गरीबो के पक्षपाती, श्री कृष्ण कुब्जा जैसी नारी के पक्षधर हैं। कृष्ण का गरीब से प्रेम भी है, भक्त पर अनुग्रह भी हैं, जीवन शैली साधारण भी हैं। मन को खींचने वाली भगवान की लीला है। मालिक अपने ही माल की चोरी करे, पुरूष अपने को ही निरावरण करे तो चोरी कैसा ?चीरहरण कैसा? माखन चोरी स्वामित्व की लीला है चीरहरण आवरण भंग की लीला है। केवल सरल ही सरल हो और तत्व ज्ञान न हो तो वह उथला पुथला हो जायेगा। भगवान की लीलाओ और उपदेशों को समझने के लिए शुद्ध बुद्धि का उपयोग करना चाहिए। भगवान की सृष्टि में सबकी आवश्यकता है, उपयोगिता है। कोई भी ऐसा अक्षर नहीं हैं जिसमें मंत्र शक्ति न हो, ऐसा कोई घास नहीं है जिसमें औषधि शक्ति नहीं है। इनका उपयोग प्रयोग करने वाला दुर्लभ है। सबका अपना-अपना स्वभाव है। गाय का स्वभाव दूध देना है बिच्छू का स्वभाव डंक देना है। जब हम किसी के निंदा स्तुति में पड़ जाते हैं तो आनंद से वंचित हो जाते हैं, अपने आप से ही अलग हो जाते हैं। जैसे भगवान शंकर के सान्निध्य में सांप, बिच्छू, शेर, नन्दी, चूहा, मोर सब शिव परिवार के वाहन बनकर रहते हैं, सब अपने स्वभाव को भूलकर एक साथ रहते हैं। वैसे ही महापुरुष के सान्निध्य में सभी जीव आपसी वैरभाव को भुलाकर मिलजुल कर रहते हैं।इस अवसर मुख्य यजमान श्री देवमणि शुक्ला सुशील शुक्ला एवं श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के अर्चक नीरज पांडेय, मंगलेश दुबे एडवोकेट पूर्व अध्यक्ष सेंट्रल बार बनारस ,मनोज मिश्रा ,एडवोकेट विनय तिवारी सागर गर्ग अनुज मिश्रा

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