सलीम मंसूरी की रिपोर्ट
जमानियां। इस्लाम में रमजान के महीने में रोजा रखना सभी बालिग (वयस्क) और समझदार मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं पर फर्ज (अनिवार्य) है। यह शारीरिक रूप से सक्षम हर व्यक्ति के लिए जरूरी है। जो बिना स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुँचाए रोजा रख सके। बच्चों, बीमारों, यात्रियों कराने वाली और मासिक धर्म वाली महिलाओं को इससे छूट मिली है। जिन्हें बाद में कज़ा (छूटे हुए रोजे) रखने होते हैं। उक्त जानकारी हाजी वसीम अहमद ने रोजा से संबंधित मुख्य बताई। किसे रखना है। बालिग (वयस्क), स्वस्थ और समझदार पुरुष और महिलाएं शामिल है। उन्होंने बताया कि रोजे से किसे छूट है। जैसे बीमार, यात्री (मुसाफिर) स्तनपान कराने वाली माताएं शामिल है। वसीम ने बताया कि बीमार या यात्री बाद में छूटे हुए रोजे (कज़ा) रख सकते हैं। बहुत वृद्ध या लाइलाज बीमारी वाले लोग फिदिया (गरीबों को खाना खिलाना) दे सकते हैं। इसके साथ ही माहवारी के दौरान महिलाओं को रोजा रखने से मना किया गया है। इन रोजों को बाद में पूरा करना होता है। हाजी वसीम ने बताया कि सहरी (सुबह सूरज निकलने से पहले) से इफ्तार (शाम सूरज डूबने के बाद) तक कुछ भी न खाना-पीना। इसका उद्देश्य आत्म-संयम, इबादत और अल्लाह की रजा हासिल करना। यह एक अनिवार्य इबादत है। लेकिन इस्लाम इंसानी सेहत को प्राथमिकता देता है। पैगंबर मोहम्मद को जब अल्लाह ने अपना नबी बनाया तो अल्लाह ने उस वक्त उनके उम्मत पर 50 दिन का रोजा रखने का हुक्म दिया था। पैगंबर मोहम्मद ने उनसे गुजारिश की कि मेरे उम्मत से 50 दिन का फर्ज रोजा हमारी उम्मत नहीं रखा जाएगा।
अल्लाह ने गुजारिश को कबूल करते हुए रमजान में 30 दिनों का रोजा उनकी उम्मत पर फर्ज किया। शेष 20 रोजा नफिल किया गया। जो ईद के बाद छह रोजे, मुहर्रम, बकरीद, शाबान, रजब आदि महीने में रखे जाते हैं। नफिल रोजों को रखने पर सवाब है। नहीं रखने पर गुनाह भी नहीं है। बालिग मुसलमानों पर रमजान के 30 रोजे फर्ज किए गए हैं।