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काशी की प्राचीन परम्परा “मसाने की होली” – आस्था, साधना और सांस्कृतिक एकता का अद्वितीय उत्सव

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सुकन्या सिंह की रिपोर्ट

 काशी की धार्मिक परम्पराओं में “मसाने की होली” का विशिष्ट और आध्यात्मिक महत्व है। यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि शिवत्व की अनुभूति और जीवन-मरण के दर्शन का अद्भुत संगम है। “बम-बम” के जयघोष से गूंजती महादेव की नगरी में नागा साधु, किन्नर समुदाय, अघोर साधक तथा सामान्य श्रद्धालु एक साथ सम्मिलित होकर इस अलौकिक परम्परा को साकार करते हैं। गृहस्थ और विरक्तों का ऐसा दिव्य समागम केवल बाबा विश्वनाथ की काशी में ही संभव है।

काशी भगवान शिव द्वारा स्थापित अविमुक्त क्षेत्र है यह सामान्य नियमो और वर्जनाओं को स्वीकार नही करती है अतः काशी में मृत्यु नहीं मोक्ष है मसाने की होली हमे सिखाती है कि मृत्यु से भय कैसा महादेव स्वयं महाकाल है उनके सानिध्य में मृत्यु भी एक परम आनन्द है इसीलिए काशी में मृत्यु का भी उत्सव मनाया जाता है यह अध्यात्म की चरम पराकाष्ठा है।

मसाने की होली एक पवित्र धार्मिक आयोजन है। विगत वर्षों में इसमें कुछ अवांछित प्रवृत्तियों के प्रवेश की शिकायतें सामने आई थीं, किन्तु गत वर्ष से संत समाज एवं स्थानीय प्रशासन के सहयोग से इसमें आवश्यक सुधार किए गए हैं, जिससे इसकी गरिमा और पवित्रता पुनः स्थापित हुई है। पारम्परिक वाद्य यंत्रों की ध्वनि और शिवभक्ति के वातावरण में प्रत्येक सहभागी स्वयं को शिवमय अनुभव करता है।

प्राप्त पारम्परिक साक्ष्यों के अनुसार, इस उत्सव को संगठित एवं उत्सविक स्वरूप लगभग 350 वर्ष पूर्व बाबा काल भैरव के तत्कालीन पीठाधिपति अघोरी उमानाथ तथा बाबा कीनाराम जी महाराज के प्रधान शिष्य बाबा बीजाराम एवं नाथ परंपरा के प्रसिद्ध संत योगी दीनानाथ के संयोजन में काशी की शैव संन्यासी परम्परा के साथ प्रारम्भ किया गया था। इन तथ्यों का उल्लेख परम्परागत प्रपत्रों एवं स्थानीय इतिहासकारों के अभिलेखों में प्राप्त होता है।

भारत के विभिन्न हिस्सों मे होली की अदभुत परंपराएं हैं जैसे बरसाने की लठ मार होली बृज की लड्डुओं की होली श्रीनाथ जी की फूलों की होली काशी की चिताभस्म होली इन परंपराओं को शास्त्रों में मत खोजें इन्हें लोकमान्यताओं में खोजेंगे तो इन अदभुत परंपराओं पर गर्व होगा

काशी के घाटों पर होली के अवसर पर संत समाज की सहभागिता प्राचीन काल से रही है। उस समय शैव समाज ‘जोगीरा’ के माध्यम से आध्यात्मिक और सामाजिक प्रश्नों का उत्तर देता था, वहीं निराकार ब्रह्म के उपासक ‘कबीरा’ परम्परा के माध्यम से जनचेतना जागृत करते थे। आज भी उत्तर भारत के अनेक भागों में जोगीरा और कबीरा की यह परम्परा जीवंत है।

वर्तमान समय में मणिकर्णिका घाट एवं हरिशचंद्र घाट पर तपोतीर्थ एवं मोक्षतीर्थ के निर्माण कार्य का विस्तारपूर्वक संचालन हो रहा है। अतः सभी श्रद्धालुओं से विनम्र आग्रह है कि वे धार्मिक मर्यादाओं का पूर्ण पालन करते हुए दर्शन-पूजन कर शीघ्रतापूर्वक महातीर्थ को प्रणाम कर विदा लें।

काशी में तर्क व शास्त्रार्थ की प्राचीन परम्परा रही है अतः विभिन्न प्रकार के विरोध व समर्थन को इसी रूप में ग्रहण करते हुए इस काशी की धार्मिक व आध्यात्मिक गरिमा को बनाए रखना और किसी भी प्रकार की धार्मिक त्रुटि या अव्यवस्था से बचना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

काशी की “मसाने की होली” सनातन परम्परा, समरसता और शिवत्व की अनुभूति का प्रतीक है। आइए, इस अद्भुत उत्सव की पवित्रता, गरिमा और आध्यात्मिकता को बनाए रखते हुए श्रद्धा एवं अनुशासन के साथ इसमें सहभागिता लिया

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