उच्चतम न्यायालय का नियम: निजी स्वामित्व से बड़ा है ‘जीवन का अधिकार’, 10 फीट का मार्ग देना अनिवार्य
मर्यादा की भूमि अयोध्या से उभरा यह कानूनी संदेश उन सभी निजी संपत्ति धारकों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो अपनी कम्प्यूटरीकृत खतौनी का दावा करके पड़ोसियों का रास्ता अवरुद्ध करते हैं। न्यायालयों ने बार-बार यह स्थापित किया है कि मालिकाना हक से बढ़कर नागरिक का जीवन का अधिकार’ है जिसमें सहज पहुँच का अधिकार निहित है। अब कोई भी भू-स्वामी, अपनी खतौनी का हवाला देकर भी, किसी नागरिक को उसके आवास तक पहुँचने के एकमात्र मार्ग से वंचित नहीं कर सकता, बशर्ते वहाँ लोगों के घर बने हुए हों। इस कानूनी संरक्षण का मूल आधार भारतीय सुखाधिकार अधिनियम, 1882 की धारा 13 है जिसे आवश्यकता का सुखाधिकार’ कहते हैं। यह सिद्धांत किसी भी लिखित समझौते की अनुपस्थिति में भी प्रभावी होता है। यह न्यायिक निर्णय नागरिकों को कानूनी दर्शन कराता है कि मौलिक अधिकार हमेशा संपत्ति के अधिकारों से ऊपर होते हैं। उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों का स्पष्ट निर्देश है कि यदि पीछे बसे परिवार के पास अपने घर तक पहुँचने का कोई वैकल्पिक सार्वजनिक मार्ग उपलब्ध नहीं है, तो सामने के भूमि स्वामी को रास्ता देना वैधानिक रूप से अनिवार्य है। ऐसे मामलों में भूमि के निजी स्वामित्व का दावा अस्वीकार्य हो जाता है क्योंकि कानून किसी भूमि को पहुँच विहीन करना अवैध मानता है। न्यायालय यह जाँचता है कि क्या मार्ग की अनिवार्यता सिद्ध होती है या नहीं। सड़क की चौड़ाई के संबंध में, शहरी क्षेत्रों में आवासों तक पहुँच मार्गों के लिए न्यूनतम 3.0 मीटर (लगभग 10 फीट) तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 3.75 मीटर (लगभग 12 फीट) की चौड़ाई अनुशंसित है।न्यायालय इस मानक को ध्यान में रखते हुए भी अनिवार्यता के आधार पर मार्ग खोलने का आदेश दे सकता है। मार्ग अवरुद्ध होने पर नागरिकों को पुलिस या स्थानीय प्रशासन के पास जाने के बजाय, सीधे दीवानी न्यायालय में स्थायी निषेधाज्ञा हेतु वाद दायर करना चाहिए और न्यायालय में यह सिद्ध करना आवश्यक है कि कोई वैकल्पिक सार्वजनिक मार्ग विद्यमान नहीं है। यह मामला स्पष्ट करता है कि न्याय की अनिवार्यता निजी स्वामित्व के दावों पर हमेशा भारी पड़ती है।