उपेंद्र यादव की रिपोर्ट
वाराणसी के चितईपुर थाना क्षेत्र से सामने आया एक मामला कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। इस प्रकरण में एक नहीं, बल्कि तीन-तीन एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। शुरुआती मामलों में हत्या के प्रयास (धारा 307) जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए, लेकिन इसके बावजूद अब तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। इससे पीड़ित परिवार लगातार भय और असुरक्षा के माहौल में जीने को मजबूर है।
पीड़ित दिनेश यादव, निवासी विश्वकर्मा नगर कॉलोनी सुसुवाही, थाना चितईपुर, के अनुसार 17 मार्च 2026 को माननीय न्यायालय के आदेश के अनुपालन में उपजिलाधिकारी सदर वाराणसी की मौजूदगी में आराजी संख्या 402 स्थित भूमि पर उन्हें विधिवत कब्जा दिलाया गया। प्रशासन की निगरानी में बाउंड्रीवाल का निर्माण कार्य भी शुरू कराया गया था, जिससे उन्हें उम्मीद थी कि अब न्याय मिल चुका है।
लेकिन अगले ही दिन, 18 मार्च 2026 को जब पीड़ित अपने प्लॉट पर निर्माण कार्य को आगे बढ़ा रहा था, तभी विपक्षीगण—संतोष यादव, सुभाष यादव, महेन्द्र यादव, विनोद यादव, राजकुमार यादव, छन्नू यादव सहित अन्य अज्ञात लोग—अचानक मौके पर पहुंचे और हमला कर दिया। आरोप है कि सभी लोग लाठी-डंडों और पत्थरों से लैस थे। उन्होंने न केवल निर्माणाधीन बाउंड्रीवाल को गिरा दिया, बल्कि पीड़ित और उसके मजदूरों पर भी जानलेवा हमला किया। ईंट-पत्थरों से किए गए इस हमले में गंभीर चोट पहुंचाने की कोशिश की गई।
पीड़ित का कहना है कि हमलावरों की मंशा स्पष्ट रूप से जान लेने की थी। मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया और सभी को अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा। पीड़ित का दावा है कि यदि वे वहां से नहीं भागते, तो बड़ी अनहोनी हो सकती थी। इस घटना के बाद गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया, जिसमें धारा 307 भी शामिल थी।
घटना के दौरान एक और गंभीर पहलू सामने आया। आरोप है कि विपक्षी पक्ष के घर की महिलाओं ने भी पुलिस टीम के साथ अभद्र व्यवहार किया। महिलाओं द्वारा पुलिसकर्मियों पर गाली-गलौज करने के साथ-साथ पथराव भी किया गया, जिससे स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई। इस तरह की घटना ने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया।
मामले ने नया मोड़ तब लिया जब विपक्षीगण हाईकोर्ट पहुंचे। बताया जा रहा है कि सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर कड़ी टिप्पणी की कि एक तरफ गंभीर अपराध के आरोप हैं और दूसरी तरफ पुलिस पर ही पथराव किया जा रहा है, और फिर भी गिरफ्तारी से बचने की बात कही जा रही है। इसी परिप्रेक्ष्य में हाईकोर्ट ने इस मामले में राहत देने से इनकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, इसके बावजूद जमीनी स्तर पर अब तक गिरफ्तारी न होना कई सवाल खड़े करता है।
मामला यहीं नहीं थमा। 19 अप्रैल 2026 को जब पीड़ित अपने प्लॉट पर पहुंचा, तो देखा कि वहां लगाया गया CCTV कैमरा तोड़कर गायब कर दिया गया है। DVR फुटेज की जांच में विपक्षी विनोद यादव कैमरा तोड़ते हुए दिखाई दिए। जब इस संबंध में सवाल किया गया, तो आरोपियों ने गाली-गलौज करते हुए जान से मारने की धमकी दी और प्लॉट छोड़ने का दबाव बनाया।
इसके अतिरिक्त, एक अन्य प्रार्थना पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि विपक्षीगण बाउंड्रीवाल निर्माण के एवज में “गुंडा टैक्स” के रूप में प्रति विस्वा 20 लाख रुपये की मांग कर रहे हैं। आरोप है कि जब पीड़ित पक्ष अपने वैधानिक अधिकार के तहत निर्माण कार्य कर रहा था, तब दबंगों ने हमला कर निर्माण सामग्री भी उठा ली और खुलेआम धमकी दी कि बिना पैसे दिए कोई निर्माण कार्य नहीं होने दिया जाएगा।
इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम सवाल यही है कि तीन-तीन एफआईआर दर्ज होने, हाईकोर्ट की टिप्पणी आने और CCTV जैसे सबूत मौजूद होने के बावजूद अब तक कोई गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई? आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई न होने से उनके हौसले लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जिससे पीड़ित परिवार दहशत में जी रहा है।
पीड़ित परिवार ने पुलिस उपायुक्त, जोन काशी सहित अन्य उच्च अधिकारियों से गुहार लगाई है कि आरोपियों के खिलाफ त्वरित और सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, उनकी गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाए और परिवार को सुरक्षा प्रदान की जाए।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस गंभीर मामले में क्या कदम उठाता है। क्या पीड़ित परिवार को समय पर न्याय मिल पाएगा, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह लंबित रह जाएगा? फिलहाल, यह पूरा घटनाक्रम कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है।