पूजा भारद्वाज की रिपोर्ट
वाराणसी। ऋषि सनातन संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूज्यश्री रतन वशिष्ठ जी महाराज ने राष्ट्रहित और सनातन एकता के प्रश्न पर वर्तमान सत्ता को स्पष्ट शब्दों में आत्ममंथन का संदेश दिया है। महाराज जी ने कहा कि सनातन समाज के किसी भी वर्ग—विशेषकर ब्राह्मण,विप्र एवं सवर्ण समाज—का अपमान केवल एक समुदाय का नहीं,बल्कि पूरे राष्ट्र की वैचारिक और सांस्कृतिक नींव का अपमान है। उन्होंने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि दशकों के संघर्ष से बनी सनातनी एकता आज नीतिगत भ्रम और सामाजिक भेदभाव के कारण कमजोर पड़ रही है। सत्ता के दंभ में यदि समाज के प्रबुद्ध वर्ग की उपेक्षा की जाएगी,तो उसका प्रभाव केवल सामाजिक नहीं,बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी पड़ेगा। महाराज जी ने कहा कि ब्राह्मण और सवर्ण समाज राष्ट्र की वैचारिक दिशा,सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। जब यही वर्ग स्वयं को उपेक्षित और असम्मानित महसूस करता है,तो समाज में असंतोष और अविश्वास की स्थिति उत्पन्न होती है,जो किसी भी राष्ट्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास साक्षी है—जब समाज भीतर से बंटता है,तब बाहरी शक्तियों को अवसर मिलता है। इसलिए आवश्यक है कि शासन व्यवस्था विभाजन नहीं,बल्कि समरसता और सम्मान की राजनीति को प्राथमिकता दे। पूज्यश्री रतन वशिष्ठ जी महाराज ने सरकार से आग्रह किया कि वह तात्कालिक राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर सनातन समाज की एकता,सम्मान और संतुलन को सुदृढ़ करे। उन्होंने दो टूक कहा कि सनातन की रक्षा किसी एक वर्ग का मुद्दा नहीं,बल्कि पूरे राष्ट्र की सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।ऋषि सनातन संघ ने यह स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य टकराव नहीं,बल्कि चेतना जगाना है—ताकि समय रहते सुधार हो सके और समाज को किसी भी प्रकार की वैचारिक या सामाजिक क्षति से बचाया जा सके।