भारत में ताजिया निकालने की परंपरा की शुरुआत 14वीं शताब्दी के अंत में बादशाह तैमूर लंग द्वारा की गई थी। मौलाना तनवीर रजा

सलीम मंसूरी की रिपोर्ट 

जमानियां भारत में ताजिया निकालने की परंपरा की शुरुआत 14वीं शताब्दी के अंत में बादशाह तैमूर लंग द्वारा की गई थी। उक्त जानकारी शाही जामा मस्जिद के सेकेट्री मौलाना तनवीर रजा ने दी। उन्होंने बताया कि कर्बला (इराक) के पवित्र मकबरे को देखने में असमर्थ होने के कारण, तैमूर ने मोहर्रम के महीने में पैगंबर मुहम्मद के नाती इमाम हुसैन की याद में भारत में इमाम बाड़े और ताजिये की प्रतिकृति बनवाने की शुरुआत की बताया जा रहा है। की ताजिया परंपरा और इतिहास जैसे

ऐतिहासिक शुरुआत 1398 ईस्वी में भारत पहुंचने पर तुर्क-मंगोल शासक तैमूर ने दिल्ली को अपना ठिकाना बनाया और स्वयं को सम्राट घोषित किया। बीमार होने के कारण जब वह मुहर्रम पर इराक नहीं जा सका। तो उसने भारत में ही इमाम हुसैन की शहादत की याद में बांस और रंगीन कागजों से पहली बार प्रतीकात्मक मकबरा ताजिया बनवाया। अवध के नवाबों का योगदान इस प्रकार रहा 18 वीं और 19 वीं सदी में अवध के नवाबों विशेषकर लखनऊ में शासनकाल के दौरान इस परंपरा को बहुत अधिक भव्यता और संरक्षण मिला। शिया परंपरा के रूप में जुलूसों में नक्काशीदार और विशाल ताजिये शामिल किए जाने लगे। मुहर्रम के पहले चांद से शुरू हुई। ताजियादारी की प्रथा आगे चलकर पूरे भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में लोकप्रिय हो गई। साम्प्रदायिक सद्भाव के साथ ऐतिहासिक और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार हिंदू समुदाय के लोग भी मुहर्रम के दौरान मन्नत पूरी होने पर अपने घरों में छोटे ‘मन्नती ताजिये’ बनाते थे। जब की शाही जामा मस्जिद के सेकेट्री मौलाना तनवीर रजा ने बताया कि हाँ, मुहर्रम के महीने में पैगंबर मोहम्मद साहब के नाती हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में ही ताजिए बनाए जाते हैं। इराक के कर्बला में शहीद हुए। इमाम हुसैन के मकबरे की खूबसूरत और कलात्मक प्रतिकृति (प्रतीक) को ही ताजिया कहा जाता है। उन्होंने कहा कि 10 मुहर्रम (यौमे आशुरा) को कर्बला की जंग हुई थी। इसी जंग में इमाम हुसैन ने जालिम शासक यजीद की अधीनता स्वीकार करने के बजाय अपने परिवार और साथियों के साथ हक और इंसाफ के लिए जान कुर्बान कर दी थी। रजा ने बताया कि ताजिया का निर्माण आमतौर पर बांस, रंग-बिरंगे कागज, और कपड़ों का उपयोग करके ताजिया का निर्माण किया जाता है। ताजिया शब्द की उत्पत्ति अज़ा शब्द से हुई है। जिसका अर्थ है। शोक (मातम) मनाना जाना। भारत में ताजिया बनाने की परंपरा की शुरुआत 14 वीं शताब्दी के अंत में मंगोल शासक तैमूर (तैमूर लंग) द्वारा की गई थी। मुहर्रम के पहले 10 दिनों के शोक के दौरान ताजियों का जुलूस निकाला जाता है। अंत में, मुहर्रम की 10 तारीख (आशुरा) को ताजिए को कर्बला या कब्रिस्तान ले जाकर दफनाया जाता है। (जिसे ठंडा करना भी कहते हैं) इस दौरान मुस्लिम भाई 10 दिनों तक लाठी द्वारा करतब दिखाते हुए। या हुसैन या इमाम की सदाएं बुलंद करते रहे है। मुहर्रम की 6 तारीख को घोड़ा दुलदुल के साथ रात्रि भर नौहा पढ़ी जाती है। इस दौरान दर्शकों को शरबत पिलायी जाती है। और मुहर्रम की 10 तारीख को सभी ताजिया को इमाम चौक से उठाकर कर्बला ले जाया जाता हैं जहां बारी बारी से दफ़न किया जाता है। उक्त मौके पर अमन शांति एकता कमेटी के सरपरस्त नेसार खान वारसी, असलम पान वाले, माहिर कमाल अंसारी, खालिद अंसारी मौजूद रहे।

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