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माह ए रमजान का पाक महीना, बरकत और रहमत से भरी हुई है।

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सलीम मंसूरी की रिपोर्ट जमानिया 

जमानियां। पाक महीने माह ए रमजान में गरीब हो या चाहे दौलत मंद सभी अल्लाह पाक की इबादत करते है। इस दौरान मुस्लिम भाइयों की दुआएं कुबूल करने की अल्लाह पाक से मन्नतें मांगते हैं। और रोजा रखते हैं। इसकी जानकारी मोहम्मद आरिफ खान वारसी ने मीडिया से रूबरू होकर बताया कि सुबह की सहरी से लेकर शाम की इफ्तार तक रोजेदारों के लिए हर दिन बेहद खास होता है। उन्होंने बताया कि रमजान इस्लामिक कैलेंडर का नवां महीना होता है। इस पूरे महीने रोजा रखा जाता है। अल्लाह पाक के आगे 5 बार नमाज अदा की जाती है। वारसी ने कहा कि 19 फरवरी से शुरू हुआ माह ए रमजान का महीना,जिस दिन चांद निकलता है। उसके अगले दिन से माह-ए-रमजान की शुरुआत हो जाती है। ऐसे में बीते बुधवार को चांद नजर आया था। जिसके चलते 19 फरवरी को भारत में माह ए रमजान का पहला रोजा रखा गया। बता दें, कि माह ए रमजान के पूरे महीने में सहरी और इफ्तार का भी एक निश्चित समय होता है। जिसका पालन करना बेहद जरूरी माना गया है। मोहम्मद आरिफ खान वारसी ने कहा कि माह-ए-रमजान बरकत, रहमत और नेकी का पवित्र महीना है। जो इबादत, आत्मसंयम और इंसानियत का संदेश देता है। इस महीने में रोजे, तरावीह की नमाज, जकात (दान) और कुरान की तिलावत से रूहानी सुकून और अमन-चैन मिलता है। यह रूहानी बादल की तरह बरकत लेकर आता है। जिसमें हर रोजा और इबादत का विशेष महत्व होता है। यह महीना खुदा की विशेष रहमतों, बरकतों और माफी का समय है।

इबादत और आत्मसंयम: रोजा रखने से न केवल प्यास-भूख का एहसास होता है। बल्कि यह सब्र और अनुशासन भी सिखाता है। रमजान ही वह पवित्र महीना है। जिसमें कुरान नाज़िल (अवतरित) फरमाया गया। जो इंसानियत के लिए हिदायत का जरिया है। उन्होंने कहा कि रोजा खोलने (इफ्तार) और सुबह के समय (सेहरी) में विशेष बरकत और रूहानियत होती है। और जकात (दान): इस महीने में दान करने का महत्व बहुत अधिक है, जो समाज में भाईचारे को बढ़ावा देता है। माह ए रमजान का हर एक लम्हा, विशेषकर आखरी दस दिन और शब-ए-कद्र, बरकत से भरा होता है। जब जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। और नेकियां कबूल की जाती हैं

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