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रोजा केवल खाने-पीने से बचना नहीं, बल्कि बुराइयों, झूठ और बेईमानी से बचकर आत्म-शुद्धि का साधन है

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सलीम मंसूरी की रिपोर्ट

जमानियां। माह-ए-रमजान का दूसरा अशरा (11 से 20 रोजे) विशेष रूप से मगफिरत (गुनाहों की माफी) का समय है। जिसे मगफिरत का अशरा’ कहा जाता है। इस दौरान रोजेदार इबादत, तौबा और कुरान की तिलावत के जरिए अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। यह समय आत्म-सुधार और रूहानी तरक्की का है। हाजी इकबाल हसन उर्फ तबस्सुम सिद्दीकी ने बताया कि

रमजान और मगफिरत के मुख्य बिंदु दूसरा अशरा रमजान के 10 से 20 दिनों के बीच का समय मगफिरत का अशरा कहलाता है। जो गुनाहों से माफी मांगने का सुनहरा मौका है। इस पवित्र महीने में अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों को माफ फरमाते हैं। उन्होंने कहा कि इबादत और दुआ से पूरे माह खुशबू की तरह महकता है। रोजेदार इस दौरान रोजा रखने के साथ-साथ नमाज, तरावीह और कुरान की तिलावत में मशगूल रहते हैं। नूरी मस्जिद लोदीपुर के इमाम साहब असरफ करीम कादरी ने बताया कि रोजेदार अगर दिल से तौबा कर लें। तो अल्लाह गुनाहों को माफ कर देता है। लिए सच्चे दिल से माह ए रमजान में माफी (तौबा) मांगने का है। रोजा केवल खाने-पीने से बचना नहीं, बल्कि बुराइयों, झूठ और बेईमानी से बचकर आत्म-शुद्धि का साधन है।इस महीने में न केवल रोजे रखे जाते हैं, बल्कि गरीब और जरूरतमंदों के साथ हमदर्दी और दान (सदका-ए-फितर) का भी विशेष महत्व रखता है।

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