कार्यालय प्रतिनिधि की रिपोर्ट
मुंबई (इंद्र यादव) आज का भारत एक अजीब से अंतर्विरोध में जी रहा है। एक तरफ ‘विश्वगुरु’ होने का शोर है, तो दूसरी तरफ एक ऐसी ‘चुप्पी’ है जो हमारे ऐतिहासिक आत्मसम्मान को लहूलुहान कर रही है। इतिहास गवाह है कि भारत की आवाज तब भी वजन रखती थी जब हम एक नवोदित राष्ट्र थे। हमने युद्ध हारे, लेकिन अपनी नैतिक गरिमा और कूटनीतिक स्वतंत्रा को कभी आंच नहीं आने दी।लेकिन आज दृश्य बदल चुका है। गूँजता हुआ ‘डंका’ शायद केवल घरेलू रैलियों तक सीमित रह गया है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर हमारे नेतृत्व की आवाज गायब है।
भय की राजनीति या कूटनीतिक कायरता!
लेख में जिस दर्द का जिक्र है, वह जायज है। जब हमारा साथ देने वाले पुराने और विश्वसनीय मित्र देशों के नेताओं को निशाना बनाया जाता है, तो भारत की खामोशी खटकती है। क्या हम इतने विवश हो गए हैं कि एक श्रद्धांजलि देने के लिए भी हमें सात समंदर पार बैठे आकाओं की अनुमति चाहिए! ट्रंप की एक नजर या व्यापारिक समझौतों का दबाव क्या हमारे सिद्धांतों से बड़ा हो गया है!
168 मासूमों की लाशें और पत्थर हुआ दिल!
सबसे ज्यादा झकझोर देने वाली बात वह तस्वीर है, जहाँ सफेद कफन में लिपटी मासूम बच्चियों की कतारें बिछी हैं। 168 मासूम जिंदगियां बुझ गईं, स्कूल की किताबें खून से सन गईं, लेकिन हमारे हुक्मरानों के पास संवेदना के दो शब्द नहीं फूटे। यह डर का वह स्तर है जहाँ राजनीति, इंसानियत पर भारी पड़ गई है।
“जब मासूमों की मौत पर भी शब्द तौलकर बोले जाएं, तो समझ लेना चाहिए कि देश की विदेश नीति का गला किसी अदृश्य पट्टे से घोंट दिया गया है।
गुलामी का नया स्वरूप!
एक संप्रभु राष्ट्र के नागरिक के तौर पर अपमानित महसूस करना स्वाभाविक है। जिस देश ने गुटनिरपेक्षता का नेतृत्व किया, आज वह शक्ति संतुलन के नाम पर नतमस्तक नजर आ रहा है। ऑपरेशन सिंदूर से लेकर मौजूदा पश्चिम एशिया संकट तक, हमारी नीतियां ‘ढुलमुल’ नहीं, बल्कि ‘दब्बू’ दिखाई दे रही हैं।
यह केवल कूटनीति की हार नहीं है, यह उस भारतीय चेतना की हार है जो हमेशा न्याय और सत्य के साथ खड़ी होती थी। क्या हम वाकई स्वतंत्र हैं, या हमारे निर्णयों की डोर कहीं और बंधी है! इन मासूमों की तस्वीरें और हमारी चुप्पी आने वाली नस्लों से क्या कहेंगी!