*हाईस्कूल का रिजल्ट तो हमारे जमाने में ही आता था…वो जमाना गुजर गया, अब बच्चो के नम्बर 95% से भी ऊपर आने पर भी बात आजकल सामान्य समझी जाती है ओर उस जमाने का 40 % वाला भी सीना तानकर पूरे मुहल्ले घूमकर हाईस्कूल पास कर लेने की भौकाल बनाता था
रिजल्ट तो हमारे जमाने में आते थे, जब पूरे बोर्ड का रिजल्ट 17 ℅ हो, और उसमें भी आप ने वैतरणी पार कर ली हो (डिवीजन मायने नहीं, परसेंटेज कौन पूछे) तो पूरे कुनबे का सीना चौड़ा हो जाता था।
दसवीं का बोर्ड…बचपन से ही इसके नाम से ऐसा डराया जाता था कि आधे तो वहाँ पहुँचने तक ही पढ़ाई से सन्यास ले लेते थे। जो हिम्मत करके पहुँचते, उनकी हिम्मत गुरुजन और परिजन पूरे साल ये कहकर बढ़ाते,”अब पता चलेगा बेटा, कितने होशियार हो, नवीं तक तो गधे भी पास हो जाते हैं
रही-सही कसर हाईस्कूल में पंचवर्षीय योजना बना चुके साथी पूरी कर देते…” भाई, खाली पढ़ने से कुछ नहीं होगा, इसे पास करना हर किसी के लक में नहीं होता, हमें ही देख लो…
और फिर , जब रिजल्ट का दिन आता। ऑनलाइन का जमाना तो था नहीं, सो एक दिन पहले ही घेराबंदी चालू हों जाती थी
पुलिस की देख रेख में शहर कोतवाली से रिजल्ट वाले अखबार का वितरण होता था और मैदागिन से लेकर विशेश्वरगंज तक छात्रों और उनके अभिभावकों की भीड़ चंपी रहती थी
अखबार लेकर आने वाले हॉकरों पर पूरी भीड़ टूट पड़ती थी और किसी तरह रिजल्ट वाला अखबार लेने की होड़ मची रहती थी, हॉकरों को भी उस दिन मनमाने पैसे हासिल हो जाते थे, अखबार हासिल करने के बाद कोना अतरा पकड़ कर धड़कते दिल के साथ रिजल्ट देखा जाता था
जिनका नम्बर अखबार में नहीं होता उनके परिजन अपने बच्चे को कुछ ऐसे ढाँढस बँधाते… अरे, कुम्भ का मेला जो क्या है, जो बारह साल में आएगा, अगले साल फिर दे देना एग्जाम…
पूरे मोहल्ले में रतजगा होता, चाय के दौर के साथ चर्चाएं चलती, अरे … फलाने के लड़के ने तो पहली बार में ही …
आजकल बच्चों के मार्क्स भी तो फारेनहाइट में आते हैं।
99.2, 98.6, 98.8…….
और हमारे जमाने में मार्क्स सेंटीग्रेड में आते थे….37.1, 38.5, 39
हाँ यदि किसी के मार्क्स 50 या उसके ऊपर आ जाते तो लोगों की खुसर -फुसर …..
नकल की होगी ,मेहनत से कहाँ इत्ते मार्क्स आते हैं।
वैसे भी इत्ता पढ़ते तो कभी देखा नहीं । (भले ही बच्चे ने रात रात जगकर आँखें फोड़ी हों)
सच में, रिजल्ट तो हमारे जमाने में ही आता था