साक्षी सिंह की रिपोर्ट वाराणसी-ट्रांसजेंडर अधिकारों को कमजोर करने वाले ट्रांसजेंडर संशोधन बिल का बनारस में हुआ विरोध|आज दिनांक 20 मार्च 2026 को बनारस क्वियर प्राइडसंगठन ने प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से संसद में प्रस्तावित ट्रांसजेंडर अधिकारसंशोधन बिल 2026 पर बनारस के ट्रांस नागरिकों की आशंका और असहमति साझा की . वक्ताओका कहना है कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर और जेंडर-डाइवर्स लोगों की गरिमा,स्वायत्तताऔर संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करता है। किन्नर समाज की सलमा चौधरी ने पत्रकारों से बताइएआप किस लिंग के हैं ये आप तय करेंगे या मोदी सरकार? ऐसा कानून जो हमारी पहचान पर नियंत्रणकरे, हम नहीं मानेंगे. हम सरकार से इसबिल प्रस्ताव को जल्द से जल्द रद्द करने की मांग करते हैं क्वियर अधिकार कार्यकर्ता टैन नेबताया कि हम इस बिल का विरोध क्यों कर रहे हैं, -1 . नागरिकों केसंवैधानिक अधिकार और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के भी खिलाफ है यह विधेयक . यहबिल सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले NationalLegal Services Authority v. Union of Indiaकीअवहेलना करता है . कोर्ट ने कहा है कि हर व्यक्ति को अपनी जेंडर पहचान तय करने काअधिकार है . इस कथन को Navtej Singh Johar v. Union of India और Supriyov. Union of India में भी दोहराया गया है। जबकि यह कानून ट्रांस नागरिकों को मेडिकलकमेटी के भरोसे और प्रशासनिक जांच के बाबुशाही वाले भ्रष्ट और उबाऊ चैनल से गुजरनेको बाध्य करता है .2 . विभिन्न ट्रांसपहचानों की उपेक्षा . विधेयक में ट्रांस व्यक्ति की परिभाषा धुंधली है . यह विधेयककानून बना तो आशंका है कि कई ट्रांस लोगों—जैसे ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिलाएँ और अन्य नॉन-बाइनरी क्वीयर अपनी पहचान से वंचित हो जाएँगे .3 . सहयोग खत्म होजाएगा .विधेयक कहता है कि “किसी को ट्रांसजेंडर बनने के लिए उकसाना अपराधहै”. जबकि समाज में अपने घरो से बिछड़े हुए क्वीयर ट्रांस साथी एक दुसरे का सहयोगकरके रहते आए हैं. इस कानून के बनने के बाद सहयोग करना अपराध माना जाएगा .4 . अतंरराष्ट्रीयस्वास्थ्य मानकों की अनदेखी WorldHealth Organization स्पष्ट रूप से मानता है कि जेंडर पहचान व्यक्तिकी स्वयं के निर्णय और विवेक पर आधारित होती है, न किकेवल जैविक लिगं पर । हमारी संसद में प्रस्तावित बिल इस वैज्ञानिक और चिकित्सासहमति को नजर अंदाज़ करता है।5.हिंसाके मामलों में कमजोर सुरक्षा बिल में ट्रांस लोगों के खिलाफ होने वाली विभिन्नप्रकार की हिंसा को एक ही धारा में रखा गया है और सजा भी BhartiyaNyay Sanhita में तय सजा से काफी कम रखी गई है।6.ट्रांसअनुभवों को मिटाना यह बिल उन लोगों को नजर अंदाज कर रहा है.जो हार्मोन थेरेपी ले रहेहैं, क्रॉस-ड्रेसरहैं, या जिन्होंने सर्जरी करवाई है यानहीं करवाई है। इससे उनकी पहचान और वास्तविक अनुभवों को नकारा जाता है।7.असमानसजा व्यवस्था ट्रांसलोगों के खिलाफ अपराधों पर कम सजा दी गई है,जबकिपहचान से जुड़े मामलों में कठोर सजा का प्रावधान है। इससे समदुाय का अपराधीकरण औरकलंकित करने की शुरूवात होगी .8.आरक्षणऔर कल्याण योजनाओं का अभाव बिल में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूदट्रांसजेंडर लोगों के लिए आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं का स्पष्ट प्रावधान नहींहै।9.जेंडर-अफर्मिंग हेल्थ केयर में बाधाएं आर्थिक रूप सेकमजोर ट्रांस लोगों के लिए हार्मोन या सर्जरी जैसी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चितनहीं की गई है। इस बिल की वजह से पहले से सीमित स्वास्थ्य सेवाएँ और कठिन हो सकतीहैं।10.समुदायके सहयोग तंत्र पर खतरा इस बिल के कुछ प्रावधान समुदाय के सहयोग नेटवर्क, कार्यकर्ताओं और संगठनों (CBOs) को भी अपराधी बना सकते हैं।11.शिक्षाऔर जागरूकता की कमी बिल में स्कूलों और विश्वविद्यालयों में जेंडर विविधता और ट्रांसपहचान के बारे में शिक्षा शामिल करने की कोई व्यवस्था नहीं है।12.जेंडरपहचान का मेडिकलकरण व्यक्ति की आत्म-पहचान के बजाय मेडिकल जांच और प्रक्रियाओं कोप्राथमिकता दी गई है।13.सामाजिकवास्तविकताओं की अनदेखी परिवार से बहिष्कार, भेदभाव, रोजगार औरशिक्षा में बाधाएँ—इन वास्तविक समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया गया है।14.पहचानप्रमाणपत्र के लिए मेडिकल बोर्ड की बाध्यता यह प्रावधान आत्म-पहचान के अधिकारके खिलाफ है और NALSA फैसले काउल्लंघन करता है।15.पारंपरिकऔर क्षेत्रीय समुदायों का बहिष्कार भारत के कई सामाजिक-सांस्कृतिक समुदायों कोपरिभाषा से बाहर रखा जा सकता है।वक्ता हेतवी जो ट्रांस महिला हैं उन्होंने बताया किकितना नुकसान होगा हमलोग को आइये जानते है ट्रांस पहचान पर नियंत्रण औरभेदभावपूर्ण संशोधन का विरोधहम सभी साथियों से अपील करते हैं कि ट्रांसजेंडरसमुदाय के अधिकारों को कमजोर करने वाले प्रस्तावित संशोधन के खिलाफ एकजुट होकरआवाज़ उठाएँ।पहचान पर मेडिकल बोर्ड और डीएम कानियंत्रण
ट्रांसपहचान पाने के लिए अब मेडिकल बोर्ड और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) की मंजूरी जरूरी बनाई जा रही है। पहचान देने सेपहले शरीर की जांच (बॉडी स्क्रीनिंग) की बात की जा रही है। यह प्रक्रिया समुदाय केलिए शर्मनाक, डरावनी और अपमानजनक है।सिर्फ कुछ पारंपरिक पहचानों को हीमान्यता
संशोधनके अनुसार केवल किन्नर, जोगती, थिरुनंगई और हिजड़ा जैसी पहचान को ही“ट्रांसजेंडर” माना जाएगा। इससे कोठी और कई अन्य स्थानीय/पारंपरिक पहचानें खत्म याअमान्य हो सकती हैं।
इसकेअलावा, इन चार घराना परंपराओं से जुड़े लोगलगातार पुलिस और प्रशासन की निगरानी में रह सकते हैं, जिससे समुदाय की आज़ादी और अपनी पहचान तय करने काअधिकार कमजोर होगा।सर्जरी को ही पहचान का आधार बनाना
संशोधनमें मेडिकल सर्जरी या लिंग परिवर्तन को ट्रांस पहचान का मुख्य प्रमाण माना जा रहाहै। इससे उन लोगों के लिए खतरा बढ़ेगा जो बिना सर्जरी के अपनी ट्रांस पहचान मेंजीते हैं (जैसे अकुआ जननियाँ आदि)।
साथ ही, अगर किसी डेरे में सर्जरी या हार्मोन से जुड़ीजानकारी सामने आती है, तो पूरे डेरेपर कार्रवाई का खतरा हो सकता है।वार्ता के अंत में नीति ने एकजुटता की अपील करते हुए कि यह संशोधन समानता और गरिमा की दिशामें हुई प्रगति को पीछे ले जाता है। जो कानून सुरक्षा के लिए बनाए गए थे, उन्हें अधिकार सीमित करने का साधन नहीं बननाचाहिए। हमारी अपील
इन सभीकारणों से हम आपसे अपील करते हैं कि इस मुद्दे की गंभीरता को समझें और इसभेदभावपूर्ण बिल का विरोध करें। अपनी आवाज़ उठाएं और ट्रांस समुदाय के सम्मान, पहचान और अधिकारों के साथ खड़े हों। हम सभीनागरिकों, क्वीयर समुदाय, सामाजिक संगठनों और साथियों से अपील करते हैं किवे इस संशोधन के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाएँ।हमारी पहचान किसी की अनुमति या जांचपर निर्भर नहीं है।
आत्म-पहचानका अधिकार हमारा मौलिक अधिकार है—और हम इसकी रक्षा करेंगे।