कृष्ण गोपाल की रिपोर्ट
वाराणसी स्थित कृषि विज्ञान संस्थान, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय “कृषि-उद्योग, शिक्षा जगत और किसानों का सम्मेलन – 2026” का शुभारंभ कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी द्वारा विधिवत किया गया। यह सम्मेलन कृषि, उद्योग और शिक्षा के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा किसानों को आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं से जोड़ने के उद्देश्य से आयोजित किया गया है।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने अपने संबोधन में कहा कि आज के समय में कृषि को केवल पारंपरिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसे एक सशक्त उद्योग के रूप में विकसित करना समय की मांग है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी है कि वे शोध और नवाचार को सीधे किसानों तक पहुंचाएं, ताकि कृषि क्षेत्र में स्थायी विकास सुनिश्चित किया जा सके।
सम्मेलन के मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित चार्टर्ड अकाउंटेंट धनंजय कुमार ओझा ने “गवर्नमेंट स्कीम, सब्सिडी, ग्रांट्स एवं कृषि उद्योग” विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। अपने उद्बोधन में उन्होंने बताया कि सरकार द्वारा किसानों के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन इनका लाभ तभी प्रभावी रूप से मिल सकता है जब किसानों को इनकी सही और समय पर जानकारी हो। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इसके लिए जागरूकता अभियान को और अधिक व्यापक और सशक्त बनाने की आवश्यकता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि ग्रामीण स्तर पर नियमित जागरूकता शिविर आयोजित किए जाएं, जिससे किसानों को विभिन्न योजनाओं, सब्सिडी और अनुदानों की पूरी जानकारी मिल सके। इसके साथ ही उन्होंने Farmer Producer Organizations (FPOs) को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया। उनका कहना था कि FPOs के माध्यम से छोटे और सीमांत किसान एकजुट होकर अपनी उत्पादकता और बाजार में अपनी पहुंच को बढ़ा सकते हैं, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
धनंजय कुमार ओझा ने कृषि क्षेत्र में स्टार्टअप्स और MSME को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि नई तकनीकों, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और नवाचार आधारित व्यवसाय मॉडल के माध्यम से कृषि को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है। इससे न केवल किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा, बल्कि युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
उन्होंने कृषि और उद्योग के बीच मजबूत संबंध स्थापित करने के लिए Public-Private Partnership (PPP) मॉडल को अपनाने की वकालत की। उनके अनुसार, जब निजी क्षेत्र की तकनीकी दक्षता और निवेश क्षमता को सरकारी नीतियों और संसाधनों के साथ जोड़ा जाएगा, तब कृषि क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन संभव हो सकेगा।
सम्मेलन के दौरान विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और किसानों के बीच विभिन्न सत्रों में गहन चर्चा हुई, जिसमें आधुनिक खेती की तकनीक, जैविक कृषि, मूल्य संवर्धन, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन और बाजार विस्तार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए और कृषि को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने के उपायों पर चर्चा की।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसानों, शोधार्थियों, उद्यमियों और विद्यार्थियों ने भाग लिया। यह सम्मेलन न केवल ज्ञान साझा करने का मंच बना, बल्कि कृषि क्षेत्र में नई संभावनाओं और सहयोग के अवसरों को भी सामने लाया।
अंत में अपने संबोधन में धनंजय कुमार ओझा ने कहा,
“जब किसान सशक्त होगा, तभी भारत आत्मनिर्भर और विकसित बनेगा। खेती को उद्योग से जोड़ना ही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है।”
यह दो दिवसीय सम्मेलन कृषि, शिक्षा और उद्योग के बीच एक मजबूत सेतु के रूप में कार्य करेगा और किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।