सलीम मंसूरी की रिपोर्ट
जमानियां। मोहर्रम की छठवीं तारीख की रात दुलदुल का जुलूस कर्बला के शहीदों की याद में एक महत्वपूर्ण और पारंपरिक जुलूस है। यह जुलूस इमाम हुसैन की शहादत के शोक और गम को व्यक्त करने के लिए निकाला जाता है। जुलूस के दौरान विभिन्न अंजुमनों (समितियों) द्वारा नौहा (शोक गीत) मर्सिया पढ़े जाते हैं। यह जुलूस तयशुदा रास्तों से होते हुए इमामबाड़ों और अखाड़ों तक जाता है। अकीदतमंद दुलदुल (घोड़े) की जियारत करते हैं। और रास्ते में उसे दूध पिलाते हैं। और मन्नतें मांगते हैं। जमानियां कस्बा में मोहर्रम की छठवीं रात को यह जुलूस पूरे पारंपरिक हर्षोल्लास और गम के माहौल के साथ निकाला जाता है। बताया जाता है। की इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार मोहर्रम के महीने के पहले 10 दिन शोक और कर्बला के शहीदों की याद में मनाए जाते हैं। इस दौरान हज़रत इमाम हुसैन के वफ़ादार घोड़े ‘दुलदुल’ (ज़ुल्जनाह) की याद में जुलूस निकालने की परंपरा है। जो मोहर्रम की अलग-अलग तारीखों (जैसे पहली, तीसरी, पांचवीं, सातवीं अखाड़ा जुलूस निकाले जाते हैं। शाही जामा मस्जिद के सेकेट्री मौलाना तनवीर रजा ने बताया कि मोहर्रम के छठवीं तारीख को इमाम हुसैन के घोड़े की याद में सजे हुए। दुलदुल का जुलूस निकाला जाता है। कर्बला की घटनाओं को याद करते हुए। जायरीन भावुक होकर सीना-पीटने और नौहा-मातम (शोक गीत) करने की रस्म अदा करते हैं। यह जुलूस आमतौर पर इमामबाड़ों से शुरू होकर पारंपरिक रास्तों (कदीमी रास्तों) से गुज़रते हुए कर्बला या इमामबाड़ों पर संपन्न होता है। उन्होंने कहा कि इस दौरान मुस्लिम महिलाएं एवं मुस्लिम पुरुष बंधु अकीदत के साथ जियारत करते है। पूरी रात रास्ते भर बड़ी संख्या में अकीदतमंद दुलदुल की जियारत करने के लिए इंतजार में खड़ा रहते हैं। जुलूस में शामिल दुलदुल को दूध और मलीदा भी खिलाते हैं। और आखों में आसूं लिए गम का इजहार करते है। इस दौरान आसपास के इलाकों से अंजुमन समिति के सदस्य शिरकत करते है। और पूरी रात नौहा ( मर्सिया पढ़ते रहते है।) इस दौरान मरहूम ताजियादार रहे। मोहम्मद नेहाल शेख मंसूरी के नवासे दानिश मंसूरी अपने आवास पर वर्षों से अखाड़ा जुलूस में शामिल लोगों को शरबत पिलाते आ रहे है। उक्त मौके पर आरिफ खान वारसी, हयात खान वारसी, अमन शांति एकता कमेटी के सरपरस्त नेसार खान वारसी, आसिफ मंसूरी, खलीफा निशात खान वारसी, आरिफ मंसूरी, अमन खान गांधी सहित मोहम्मद शाहिद जमाल मंसूरी, अफजाल मंसूरी, साजिद मंसूरी, वकील राइन, सद्दाम राइन, राजू राइन, महताब राइन सहित आदि मुस्लिम बंधु शामिल रहे।