वाराणसी- प्रह्लाद घाट स्थित भारद्वाजी टोला के कर्मकुल में चल रही सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का सातवां और अंतिम दिवस मानो केवल एक दिन नहीं, एक संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का चरम क्षण बन गया। प्रतिभा पाण्डेय के स्नेह, श्रद्धा और संयोजन से सुशोभित यह स्थल सोमवार को सुबह से ही एक अदृश्य ऊर्जा से घिरा प्रतीत हो रहा था। दीयों की लौ, धूप की सुगंध और मंत्रों की अनुगूंज मिलकर ऐसा वातावरण रच रही थीं जिसमें प्रत्येक श्रोता किसी शांत नदी की तरह भीतर ही भीतर बहता चला जाता था। बाल व्यास रूपेश पाण्डेय और प्रभाकर नारायण तिवारी ने सुदामा चरित्र का जो वर्णन किया, वह केवल कथा नहीं एक अनुभूति थी। उनकी वाणी में ऐसी कोमलता थी कि सुदामा का प्रत्येक कदम, प्रत्येक भाव, प्रत्येक मौन श्रोताओं के भीतर स्पष्ट दिखाई देने लगा। सुदामा का चलना मानो विनम्रता की पदचाप हो। उनकी गृहस्थी मानो संतोष का वासस्थल हो। कृष्ण के लिए उनका प्रेम इतना निष्कपट कि स्वयं ईश्वर को दौड़कर द्वार खोलना पड़ा। सुदामा की चावल की पोटली जब कथा में खुली तो लगा मानो हर श्रोता के भीतर भी कोई पुरानी गांठ खुल रही हो। एक ऐसी गांठ, जिसमें वर्षों का अहंकार, चाह और अपेक्षाएं छुपी थीं। उस क्षण यह अनुभव हुआ कि ईश्वर को मूल्य नहीं, भाव चाहिए। और भाव जितना सरल होता है, ईश्वर उतनी ही शीघ्रता से समीप आ जाते हैं। कथा का अगला प्रसंग परीक्षित मोक्ष था, जिसे व्यासों ने अत्यंत शांत, धीमी, लेकिन भीतर तक उतर जाने वाली शैली में रखा। जब परीक्षित के अंतिम क्षणों का वर्णन हुआ, मृत्यु का दंश, शरीर का त्याग, परंतु मन का एक क्षण भी कृष्ण से न हटना तब पूरा परिसर अप्राप्य शांति से भर गया। लगा जैसे समय रुक गया हो, जैसे हर श्रोता अपने भीतर के अंतिम प्रश्न को देख रहा हो कि मृत्यु क्या है? अंत या आरंभ? व्यासों ने बताया कि जिसने जीवन भर भीतर के कृष्ण को जगा लिया, उसके लिए मृत्यु केवल आवरण बदलने जैसा है। इस गूढ़ संदेश ने कई श्रोताओं को भीतर तक हिला दिया, एक ऐसी हलचल, जो शांत दिखती है पर आत्मा में गहराई तक उतर जाती है। अंतिम दिन भजन-कीर्तन की स्वरधारा ने पूरे स्थल को मानो किसी दैवीय संगीत में लपेट लिया। महायज्ञ का धुआं केवल वातावरण नहीं, मन को भी शुद्ध कर रहा था। प्रसाद ग्रहण करते समय सभी के चेहरे पर वही शांत उजाला था जो केवल सात दिनों तक निरंतर सुनने, समझने और भीतर उतराने से प्राप्त होता है। कथा के दौरान विनय पाण्डेय, राघवेंद्र पाण्डेय, प्रिया पाण्डेय, आशुतोष पाण्डेय, रश्मि दुबे, संदीप दुबे सोनू, जयश्री पाण्डेय, कविता पाण्डेय, जान्ह्वी पाण्डेय, वीरभद्र दुबे, गौरवी पाण्डेय, रूद्रेश पाण्डेय, मृत्युंजय पाण्डेय समेत अन्य श्रद्धालुओं उपस्थित थें।