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काशी में आस्थावान दर्शनार्थियों की भारी भीड़ से व्यवस्थाएं चरमराई, पैदल निकला भी हुआ दुभर 

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काशी में आस्थावान दर्शनार्थियों की भारी भीड़ से व्यवस्थाएं चरमराई, पैदल निकला भी हुआ दुभर

होटल, लॉज, धर्मशाला, नाव फुल, मंदिरों में उमड़ रहीं हैं लाखों भक्तों की भीड़ सड़क से लेकर गलियों तक दिन-रात भीषण जाम .काशीवासियों को बाबा विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए अलग से लाइन लगाने की उठने लगी मा

वाराणसी। नव वर्ष के पूर्व काशी में देश विदेश से लाखों की तादाद में पहुंच रहे सैलानियों,दर्शनार्थियों का उमड़ा जनसैलाब के कारण यहां की हर व्यवस्थाएं पूरी तरह चरमरा गई है। बिना जाँच पड़ताल के दर्शनार्थी के भेष धारण किये कौन उग्रवादी हैं, कौन आतंकवादी हैं, कौन नक्सलवादी हैं यह पहचान करना मुश्किल हो गया हैं। भीड़ का फायदा उठाकर कहीं कोई अमिट अनहोनी न हो जाये इसकी भी चिंता बनी हुई हैं। पुलिस-प्रशासन के साथ ही साथ काशीवासियो की भी जिम्मेदारी यह बढ़ गईं हैं की यहां सब कुछ कुशल पूर्वक सम्पन्न हो जाये, काशी पर कोई कलंकित दाग न लगने पाये। आलम यह है कि स्थानीय लोगों को पैदल निकलना भी दुश्वार हो गया है। यह तो संयोग अच्छा है कि काशी में कड़ाके की ठंड पड़ रही है जिसके कारण स्कूल, कॉलेजों को बंद कर दिया गया है नहीं तो जिस तरह मरीजों को आने -जाने में परेशानी हो रहीं हैं उससे कहीं अधिक छात्र-छात्राओं, बच्चों को भी काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता। काशी में अचानक से आए आस्थावान लाखों भक्तों, दर्शनार्थियों, सैलानियों से जहां काशी के सभी घाट पटे पड़े हैं वहीं गंगा आरती देखने, नौकाविहार करने, मंदिरों में जाने के लिए लाखों की तादात में दर्शनार्थी पहुंच रहे हैं। मानक को दरकिनार करके नौका संचालन किया जा रहा है, खाने-पीने के नाम पर उनसे मन मुताबिक लूट मची हुई है, ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि काशी के स्थानीय लोगों का क्या हाल होगा। बाबा काशी विश्वनाथ के मंदिर में बाहरी दर्शनार्थियों, सैलानियों के लिए तो व्यापक सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करने की बात की जा रही है लेकिन यहां के स्थानीय बाशिंदो दर्शनार्थियों को दर्शन करने के लिए अलग से कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है। ऐसे में काशी के नियमित और दर्शनार्थियों की मांग उठने लगी हैं की बाबा काशी विश्वनाथ का दर्शन प्राप्त करने के लिए मंदिर में एक अलग से लाइन लगाने की सख्त आवश्यकता है, जिसके कारण काशी के लोग बाबा विश्वनाथ का दर्शन आसान तरीके से कर सके। हालांकि माना जा रहा है कि काशी के लोगों को एक लाइन या एक गेट से प्रवेश दिये जाने के बाबत कई सवाल खड़े होंगे, तो ऐसे में जांचोपरान्त उन्हीं दर्शनार्थियों को मंदिर में प्रवेश दिया जाए जिनके पास काशी का आधार कार्ड हो या काशी का कोई ऐसा दस्तावेज, प्रमाण पत्र, परिचय पत्र हो जिससे यह साबित हो कि वह मूल रूप से काशी का ही रहने वाला है। बाहरी यात्रियों के कारण काशी के लोग काफी उत्साहित, खुश भी है। यहां के व्यापारी, यहां के खान-पान के दुकानदारों की कमाई जरूर बढ़ी है, लेकिन अत्यधिक भीड़ होने के कारण काफी दुश्वारियां भी सामने है। लाखों लाख यात्रियों की काशी में आने से यातायात व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। यात्रियों के भीड़ को देखते हुए ऑटो रिक्शा, टोटो चालक, निजी वाहन और भाड़े के वाहन चालकों की भी चांदी कट रही है। वह भी मनमाना किराया वसूल कर रहे हैं। यात्रियों की अत्यधिक भीड़ होने के कारण पुरी काशी इस समय भीड़ से खचाखच भर गई है। ऐसे में उन बाहरी तीर्थयात्रियों की सुरक्षा व्यवस्था का भी ख्याल रखने का शासन प्रशासन पूरी तरह से लगा जरूर हुआ है लेकिन वह पर्याप्त नहीं दिख रहा है। ऐसे में काशी में आए हुए यात्रियों को सुगम, सुलभ और सस्ती यात्रा दर्शन-पूजन एवं जलपान की व्यवस्था के लिए बाहरी फोर्स की भी सख्त आवश्यकता दिख रही है। गंगा नदी में हजारों की संख्या में छोटे-बड़े नाव, बजड़े, मोटर बोट, क्रूज, स्टीमर का संचालन किया जा रहा हैं जिन पर मानक के विपरीत यात्रियों को बैठाया जा रहा है वह भी बिना सुरक्षा कवच के। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि कोई अप्रिय घटना होती है तो एक तरफ तो यात्रियों की जान पर बन पड़ेगी तो वहीं दूसरे तरफ काशी की छवि भी धूमिल होगी। बताते चले की काशी (वाराणसी) एक ऐसा शहर है जो अपने प्राचीन इतिहास, धार्मिक गहराई और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के साथ आधुनिकता को समेटे हुए है, जहाँ हर गली और घाट एक कहानी कहता है। इसी जिंदादिली को देखने, समझने, परखने, महसूस करने की मंशा लेकर लाखों देशी विदेशी सैलानी लोग यहां आते हैं। काशी का इतिहास हज़ारों साल पुराना है, जो शिव द्वारा स्थापित एक पवित्र नगरी है और भारत के सबसे प्राचीन, लगातार बसे शहरों में से एक है, यह शहर गंगा तट पर स्थित है और वैदिक काल से ही धर्म, शिक्षा, संस्कृति जैसे संगीत, कला, हस्तशिल्प, बनारसी साड़ी और आयुर्वेद का केंद्र रहा है, जहाँ मोक्ष की अवधारणा, विश्वनाथ मंदिर, और अनेक घाटों की परंपराएँ जैसे दशाश्वमेध इसे ‘ज्ञान नगरी’ और ‘मोक्ष की नगरी’ बनाती है।जिसमें कबीर, तुलसीदास, प्रेमचंद, बिस्मिल्लाह खां जैसे मनीषियों का वास रहा है और बौद्ध धर्म व जैन धर्म के लिए भी महत्वपूर्ण है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने लगभग 5 हजार साल से पहले इसकी स्थापना की थी, जबकि इतिहासकारों के अनुसार यह कम से कम 3 हजार साल से अधिक पुराना है। यह हिंदुओं की सप्तपुरियों में से एक है और इसे ‘भगवान शिव की नगरी’ कहा जाता है। इसका उल्लेख ऋग्वेद, पुराणों, रामायण और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। यह हमेशा से भारत का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र रहा है, जिसे ‘मंदिरों का शहर’, ‘धार्मिक राजधानी’, ‘दीपों का शहर’ और ‘ज्ञान नगरी’ कहते हैं। कबीर, रविदास, तुलसीदास (जिन्होंने यहीं रामचरितमानस लिखी), मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, पंडित रविशंकर, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां जैसे महान व्यक्ति यहाँ रहे हैं। गौतम बुद्ध ने अपने प्रथम उपदेश सारनाथ (काशी के निकट) में दिए थे, जिससे यह बौद्ध धर्म के लिए भी महत्वपूर्ण है। जैन धर्म के लिए भी यह पवित्र स्थान है। यह मलमल, रेशमी कपड़ों, बनारसी साड़ी, इत्र, हाथी दांत और शिल्प कला के लिए प्रसिद्ध रहा है। गंगा नदी में स्नान करना, गंगाजल का आचमन करना और दशाश्वमेध घाट पर होने वाली  शाम की आरती प्रमुख परंपराएँ हैं। यहाँ के त्योहार, मेले, और रामलीला (लोकनाट्य) प्रसिद्ध हैं। बनारस घराना (शास्त्रीय संगीत), नृत्य और लोक संगीत की समृद्ध परंपराएँ हैं। बनारसी पान, ठंडई, लस्सी, कचौड़ी और स्वादिष्ट मिठाइयाँ यहाँ की पहचान हैं। यह प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान (सुश्रुत, धन्वंतरी) का केंद्र रहा है और यहाँ कई विश्वविद्यालय हैं। मृत शरीर के साथ ऊर्जा के प्रयोग से जुड़ी अघोरी परंपरा भी यहाँ की एक रहस्यमयी पहचान है। यहां के अल्हड़पन, परम्परा, शांति, मोक्ष की सुगमता ही ऐसी है की देशी- विदेशी खींचे चले आते है। कई तो ऐसे भी यहां आये की यहीं के होकर रह गये। कुल मिलाकर कहा जाय तो                                                               काशी (बनारस) को अगर बारीकी से जानना है, पहचानना है, देखना है, महसूस करना है, कुछ पाना है, कुछ सीखना है, तो यहां कुछ समय बिताना ही पड़ेगा। इसके अलावा कोई दूसरा वैकल्पिक रास्ता नही है।

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