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आध्यात्मिकता और आधुनिकता के संतुलन से ही संभव है वास्तविक विकास: कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा

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कार्यालय प्रतिनिधि की रिपोर्ट 

वाराणसी, 15 मार्चः स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज द्वारा आयोजित • आध्यात्मिकता: वैश्विक कल्याण, सततता और डिजिटल सजगता के लिए एक सिद्ध प्रतिमान विषयक तेरहवें अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस का समापन हुआ । समापन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि आध्यात्मिकता भारत की आत्मा में निहित है। यह केवल एक दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि इस देश की सांस्कृतिक चेतना और जीवन-पद्धति का मूल आधार है। उन्होंने कहा कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी इस भूमि की महत्ता का उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में वर्णित है कि जो भूभाग समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में स्थित है, वही भारतवर्ष है। यह केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि एक ऐसी दिव्य भूमि है जहाँ ज्ञान, साधना और मानव कल्याण की परंपरा निरंतर प्रवाहित होती रही है।

प्रो. शर्मा ने कहा कि इस पवित्र भूमि में जन्म लेने वाला व्यक्ति साधारण नहीं होता। ‘भा’ का अर्थ है प्रकाश और ‘रत’ का अर्थ है उसमें लीन होना। अर्थात जो व्यक्ति ज्ञान, प्रकाश और सरस्वती की उपासना में सतत लीन रहता है, वही सच्चे अर्थों में भारतीय है। ऐसे व्यक्तियों द्वारा की गई सृजनात्मकता और चिंतन केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक कल्याण के लिए होता है। यही कारण है कि भारत की चिंतन परंपरा सदैव “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के आदर्श को सामने रखती है, जहाँ केवल अपने ही नहीं बल्कि समस्त विश्व के कल्याण की कामना की जाती है।

प्रो. शर्मा ने ईशावास्योपनिषद का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व यह उद्घोष किया था कि इस संसार के प्रत्येक कण में ईश्वर का वास है। आधुनिक विज्ञान ने भी जब यह सिद्ध किया कि प्रत्येक कण में ऊर्जा निहित होती है, तो हमारे प्राचीन ज्ञान की पुष्टि हुई, जिसे आधुनिक विज्ञान ने “गॉड पार्टिकल” जैसे नामों से संबोधित किया। उन्होंने कहा कि विज्ञान जितना आगे बढ़ेगा, उतना ही हमारे शास्त्रों की प्रासंगिकता और प्रमाणिकता पुष्ट होती जाएगी। उन्होंने कहा कि आज विश्व में जो मानसिक तनाव और असंतुलन की समस्या बढ़ रही है, उसका समाधान भारत की ज्ञान परंपरा में निहित है। भारतीय दर्शन हमें यह सिखाता है कि आधुनिकतम ज्ञान को अपनाते हुए भी हमें अपनी मूल सांस्कृतिक धारा से जुड़े रहना चाहिए। जब आध्यात्मिकता और आधुनिकता का संतुलित समन्वय होगा, तभी वास्तविक विकास संभव हो सकेगा।

मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए संस्थान के निदेशक प्रो० पी० एन० झा ने सम्मेलन के दो दिनों के सफल आयोजन का उल्लेख करते हुए कहा कि आज के समय में जब तकनीकी प्रगति और डिजिटल विस्तार ने मानव जीवन को नई दिशा दी है| हम अपने पारंपरिक ज्ञान और आध्यात्मिक मूल्यों को भी उतनी ही गंभीरता से समझें और उन्हें समकालीन संदर्भों में प्रस्तुत करें। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा सदैव से संतुलन, सह-अस्तित्व और मानव कल्याण के मूल्यों पर आधारित रही है और यही मूल्य आज के वैश्विक समाज के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन प्लेनरी सत्र का आयोजन हुआ जिसमे गोवा से अध्यात्मिक शोधकर्ता शॉन क्लार्क एवं दुबई से बोधि शुद्धानंद ब्रह्मचारी, संस्थापक, लोक नाथ डीवाइन लाइफ मिशन सम्मिलित हुए | इसी क्रम में चौदह अलग अलग तकनीकी सत्रों व पांच ऑनलाइन सत्रों का आयोजन भी हुआ । जिसमें ऑस्ट्रेलिया, दुबई, कैनेडा,ओमान, बंगलादेश और नेपाल सहित देश के कोने-कोने से आये लगभग 300 प्रतिभागियों ने शोध-पत्र प्रस्तुत किया ।

समापन सत्र का संचालन सह-संयोजक प्रो० पल्लवी पाठक व धन्यवाद ज्ञापन कॉन्फ्रेंस के समन्वयक प्रो० अमिताभ पांडेय ने दिया। दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस की विस्तृत रिपोर्ट प्रोफेसर अविनाश चंद्र सुपकर ने प्रस्तुत की।

इस अवसर पर एस०एम० एस० वाराणसी के अधिशासी सचिव डॉ० एम० पी० सिंह, निदेशक प्रो० पी० एन० झा, कुलसचिव श्री संजय गुप्ता, प्रो० संदीप सिंह सहित समस्त अध्यापक और कर्मचारी गण उपस्थित रहे ।

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