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माह-ए-रमजान इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र और बरकत वाला महीना है, जो आत्मसंयम, इबादत, दान और मगफिरत (माफी) का संदेश देता

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सलीम मंसूरी की रिपोर्ट

जमानियां। माह-ए-रमजान इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र और बरकत वाला महीना है, जो आत्मसंयम, इबादत, दान और मगफिरत (माफी) का संदेश देता है। इस माह में रोजा रखना अनिवार्य है, जन्नत के दरवाजे खुल जाते हैं, जहन्नम के दरवाजे बंद हो जाते हैं और शैतान जंजीरों में जकड़ दिए जाते हैं। इस दौरान की गई इबादत का सवाब कई गुना बढ़ जाता है। रोजेदार रुकसाना बानो, रोजेदार मोहम्मद शकील अहमद ने बताया कि माह ए रमजान की फजीलत और बरकत रहमत और का महीना है। यह महीना अल्लाह की रहमतों का दौर है। जिसमें हर नेक काम का सवाब सत्तर गुना तक बढ़ जाता है। माह ए रमजान में एक रात (शबे कद्र) ऐसी है। जो हजार महीनों से बेहतर है। इस पाक महीने में रोजादार की दुआ कबूल होती है। उन्होंने बताया कि खासकर इफ्तार के वक्त, रद्द नहीं की जाती (कबूल होती है) और माह ए रमजान आते ही जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। और जहन्नम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। यह वह महीना है। जिसमें कुरान शरीफ नाजिल हुआ, जिससे इसकी अहमियत और बढ़ जाती है। रुकसाना, मोहम्मद शकील ने बताया कि माह ए रमजान के मुख्य आमाल सुबह सादिक (सहरी) से सूर्यास्त (इफ्तार) तक बिना कुछ खाए ना पिए सिर्फ इबादत करना चाहिए। ईशा की नमाज के बाद विशेष तरावीह की नमाज सभी मुस्लिम रोजेदारों को अदा करना चाहिए। और ज्यादा से ज्यादा कुरान की तिलावत करना चाहिए। इस महीने में कुरान-ए-पाक को पढ़ने और समझने पर जोर दिया जाता है। जरूरतमंदों की मदद करना और फितरा व जकात अदा करना चाहिए। माह ए

रमजान आत्म-सुधार और अल्लाह के करीब आने का एक रूहानी मौका है। जहाँ 30 दिन की इबादत से रूह को सुकून और गुनाहों से माफी मिलती है।

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