सलीम मंसूरी की रिपोर्ट
जमानियां। माह ए रमजान का महीना हर मुसलमान के लिए बेहद अहम उर्दू बाबू वज़ाहतुल्ला सिद्दीकी ने बताई।
उन्होंने बताया कि माह ए रमजान के महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग रोजे रखते हैं। पाबंदी से नमाज पढ़ते हैं। मुसलमानों के विश्वास के अनुसार इस महीने में कुरान का नाजिल (अवतरण) हुआ है। इसलिए इस महीने में क़ुरान ज्यादा पढ़ना पुण्यकार्य माना गया है। रमजान के महीने में हर दिन की नमाज के अलावा रात के वक्त एक विशेष नमाज भी पढ़ी जाती है। जिसे तरावीह कहते हैं। इस्लाम में माह ए रमजान के पाक महीने को तीन हिस्सों में बांटा गया है। और तीनों हिस्सों का अपना अलग अलग महत्व बताया गया है। अशरा अरबी का शब्द है। जिसका मतलब 10 होता है। यानी 10 दिन का समय एक अशरा कहलाता है। इसमें रमजान के पहले 10 दिन को पहला अशरा कहा जाता है। जबकि 11वें रोजे से 20 वें रोजे तक दूसरा अशरा कहते हैं। इसके बाद 21वें रोजे से 29 या 30 वें रोजे तक तीसरा या आखरी अशरा कहा जाता है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार माह ए रमजान के पहले अशरे में रहमत है। दूसरे अशरे में मगफिरत यानी माफी है। और इसके आखिर अशरे में जहन्नम की आग से बचाव है। रमजान को नेकियों का महीना भी कहा जाता है। यह महीना समाज के गरीब और जरूरतमंदों के साथ हमदर्दी का है। इस महीने में रोजादार को इफ्तार कराने वाले के गुनाह माफ हो जाते हैं। इस महीने में अल्लाह की राह में खर्च करना अफजल है। ग़रीब चाहे किसी भी धर्म के क्यों न हो। इस महीने में लोग उनकी खूब मदद करते है। इस्लाम में दूसरों के काम आना भी एक इबादत समझी जाती है। रमजान का महीना जहां एक तरफ आपको अपने सहन और दिल पर काबू करना सिखाता है। वहीं दूसरी तरफ आपको इबादत करने की तालीम देता है। इस माह ए रमजान में आप अपने घर पर रहकर ही इबादत करें और नमाज पढ़ें। और आप अल्लाह से खूब दुआ करें। कि अल्लाह रब्बुल इज्जत हमारे मुल्क एवं तमाम इंसानियत की इससे हिफाजत फरमाए।