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रमजान को नेकियों का महीना कहा जाता है। माहिर कमाल अंसारी

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सलीम मंसूरी की रिपोर्ट

जमानियां। रमजान का महीना मोमिनों के लिए खुदा की तरफ से अजमत, रहमत और बरकतों से भरा होता है। लेकिन अल्लाह ने इस मुबारक महीने को तीन अशरों में बांटा है। और तीनों अशरों का अपना अपना महत्व है। माहिर कमाल अंसारी ने बताया जाता है। की चांद के दीदार के साथ दुनियाभर में मुकद्दस माह रमजान की शुरुआत हो गई है। ये महीना मोमिनों के लिए खुदा की तरफ से अजमत, रहमत और बरकतों से भरा होता है। लेकिन अल्लाह ने इस मुबारक महीने को तीन अशरों में तक्सीम किया है। रोजेदार माहिर कमाल अंसारी ने बताया कि पहला अशरा खुदा की रहमत वाला है। पहले अशरे में 10 दिनों तक अल्लाह की रहमत से सभी सराबोर होते है। एक से 10 रमजान यानी पहले अशरे में खुदा की रहमत नाजिल होती है। दसवीं रमजान से दूसरा अशरा शुरू होता है। रमजान का पहला अशरा बेशुमार रहमत वाला होता है। उन्होंने कहा कि माह ए रमजान के महीने के तीस दिनों को 3 अशरों (10 दिन) में बांटा गया है। रमजान के पहले 10 दिन को पहला अशरा, दूसरे 10 दिनों को दूसरा अशरा और आखिरी 10 दिन को तीसरा अशरा का जाता है। यानी पहले रोजे से 10 वें रोजे तक पहला अशरा, 11वें रोजे से 20 वें रोजे तक दूसरा अशरा और 21 वें रोजे से 30 वें रोजे तक तीसरा अशरा। अंसारी ने कहा कि पैगंबर साहब (सल्ल.) की एक हदीस है जिसका मफूम है- रमजान का पहला अशरा रहमत वाला है, दूसरा अशरा अपने गुनाहों की माफी मांगने का है और तीसरा अशरा जहन्नम की आग से अल्लाह की पनाह चाहने वाला है। (मफूम) रमजान के पहले अशरे में अल्लाह की रहमत के लिए ज्यादा से ज्यादा इबादत की जानी चाहिए। इसी तरह रमजान के दूसरे अशरे में अल्लाह से अपने गुनाहों की रो-‍रोकर माफी माँगनी चाहिए। रमजान की तीसरा अशरा जहन्नम की आग से अल्लाह की पनाह माँगने का है। कई चीजों की सीख देता है मुकद्दस माह ए रमजान कस्बा बाजार स्थित शाही जामा मस्जिद के इमाम हाफिज तौहीद रजा एवं सेकेट्री मौलाना तनवीर रजा के मुताबकि रमजान का हर पल महत्व रखता है। मजहबी तौर पर तो इसके फायदे हैं ही दुनियावी तौर पर भी रमजान हमें वक्त की पाबंदी, वक्त की कीमत, सच्चाई की कद्र, परहेजगारी, बड़ों का आदर, गरीबों पर रहम आदि कई चीजें सिखाता है और ये संदेश देता है कि इस अभ्यास को अगले ग्यारह महीन चलाना चाहिए। दोनों आलिमों ने बताया कि अगले 11 महीनों के जीवन का अभ्यास कराता है। रमजान, उन्होंने बताया कि, रोजा ही एक ऐसी इबादत है। जिसमें इंसान और अल्लाह का सीधा संपर्क होता है। क्योंकि अगर कोई नमाज पढ़ रहा है तो दूसरा आदमी देख रहा है। जकात दे रहा है। तो इसमें भी एक हाथ देता है। लेने वाला दूसरा हाथ सामने रहता है। रोजा की नमाज में अल्लाह और रोजेदार के अलावा तिसरा कोई नही जानता है। की अल्लाह से क्या वार्ता हुई। उन्होंने कहा की रमजान में नहीं बल्कि हमेशा कुरान शरीफ की खूब तिलावत करनी चाहिए। नफिल नमाज पढ़नी चाहिए। सारी बुराइयों से दूर रहना चाहिए। यह महीना ऐसा है। जो आदमी को आदमी से मिलाते हुए। ग्यारह महीनों तक लगातार नेक काम करने बुराई से बचने का अभ्यास कराता है।

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