कृष्ण गोपाल की रिपोर्ट
भगवान का स्वरूप सचिदानन्द है। भगवान से सम्बंध छूटने से ही जीवन में भय, दुःख शोक का प्रादुर्भाव हो जाता है इसीलिए भागवत का सार है कि हमारी निष्ठा सच्चिदानंदमय बनी रहे। सभी जीव सच्चिदानंदमय होने से एक दूसरे से अभेद हैं, इसीलिए जीवन में अभेद भाव बना रहना चाहिए। जीव के जीवन में ताप की निवृत्ति ही भागवत एवं भगवान के लीला श्रवण का रहस्य है।
भगवान के लीला रहस्यों के श्रवण से जीवन में पाप का फल ताप का समावेश नहीं होता है। परीक्षित के जीवन में पाप का फल ताप आ
जाने से भगवान सुखदेव जी द्वारा भागवत ज्ञान द्वारा अभेदता प्राप्त होने से ही उनके जीवन का ताप नष्ट हुआ। भागवत के श्रवण मात्र से ही जीवन में पूर्णता प्राप्त हो जाती है।
गुरुजन के प्रति जीवन में प्रीति होने से ही उनकी प्रसन्नता से देव दुर्लभ बैकुण्ठ भी प्राप्त हो जाता है। संसार के संताप से छुड़ाने वाला देव दुर्लभ भागवत भी गुरुदेव सुखदेव की प्रसन्नता से परीक्षित को सहज ही प्राप्त हो गई। अर्थात जीवन में संताप की निवृत्ति गुरुदेव की प्रसन्नता से ही हो सकती है। संशय की निवृत्ति ज्ञान से ही होती है। श्रवण के बिना किसी भी अज्ञात वस्तु का ज्ञान नहीं हो सकता है। अखिल गुरु नारायण ही हैं। भगवान नारायण जी ने ब्रह्मा जी को ज्ञान दिया कि सततत्व क्या है, जगत क्या है, माया क्या है और आत्मा क्या है। इन चारों का ज्ञान प्रत्येक व्यक्ति के लिए जरूरी है। राजा परीक्षित ने प्रश्न किया कि जिस व्यक्ति की मृत्यु निश्चित हो जाय कि सात दिन में मरना है तो उसका कर्तव्य क्या है। सुखदेव जी ने बताया कि भगवान का चिंतन करने से मन राग-द्वेष से मुक्त हो जाता है। भगवान के चौबीस अवतारों का वर्णन भागवत में किया गया है, दुष्टों का दमन साधु पुरुषों का रक्षण भगवान के विशेष कार्य हैं। सनातन धर्म में एक ही परमात्मा अनेक नामरूपों से वर्णन किया गया है। भगवान के लीला चरित्रों को श्रवण करके कोई भी मनुष्य अन्तःकरण को पवित्र कर सकता है।