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वाराणसी: श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ में कपिल देव उपदेश का महत्व

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वाराणसी: श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ में कपिल देव उपदेश का महत्

वाराणसी। अस्सी क्षेत्र स्थित श्री काशीधर्मपीठ, रामेश्वर मठ प्रांगण में चल रहे श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ सप्ताह के तीसरे दिन पूज्यपाद अनंतश्री विभूषित जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ जी महाराज ने भक्तों को गहन आध्यात्मिक उपदेश प्रदान किए।

कर्दम-देवहूति और भगवान कपिल का प्रसंग

जगद्गुरु जी ने बताया कि ब्रह्मा जी के पुत्र कर्दम ऋषि ने कठोर तपस्या द्वारा भगवान को कपिल रूप में प्राप्त किया। माता देवहूति, जो मनु-सतरूपा की पुत्री थीं, उनके साथ तप, संयम और ब्रह्मचर्य के प्रभाव से भगवान स्वयं पुत्र रूप में प्रकट हुए।

उन्होंने कहा—

जहाँ संयम, त्याग, ब्रह्मचर्य और ईश्वर उपासना होती है, वहीं भगवान का अवतरण होता है।

भगवान कपिल ने माता देवहूति को उपदेश दिया कि धन, भोग और बंधु में आसक्त मन बंधन का कारण है, जबकि ईश्वर में स्थित मन मुक्ति का मार्ग है।

त्याग और वैराग्य का संदेश

माता देवहूति ने स्वयं स्वीकार किया कि संसार के भोगों से उन्हें वैराग्य हो गया है। जगद्गुरु जी ने बताया कि सनातन धर्म की परंपरा में त्याग और ईश्वर अनुभूति ही जीवन का परम लक्ष्य है।

कर्दम ऋषि ने भगवान कपिल के प्रकट होने के पश्चात संन्यास धारण कर वन गमन किया, जिस पर भगवान कपिल ने उपदेश दिया—

मन को भगवान में लगाकर ही मुक्ति संभव है।

सांख्य शास्त्र और धर्म का आधार

भगवान कपिल ने सांख्य शास्त्र का उपदेश देते हुए स्पष्ट किया कि धर्म तभी सफल होता है जब वह ईश्वर के आश्रय में किया जाए।

ऋषि अत्रि एवं माता अनुसुइया ने ईश्वर आश्रय लेकर धर्म किया, जिससे उनके घर भगवान दत्तात्रेय का प्राकट्य हुआ।

वहीं दक्ष प्रजापति का यज्ञ भगवान शिव के अपमान के कारण सफल नहीं हो सका।

ईश्वर की उपेक्षा कर किया गया धर्म कभी पूर्ण फलदायी नहीं होता।

जगद्गुरु जी ने माता सुनीति और सुरुचि का उदाहरण देते हुए कहा—

सुनीति के पुत्र ध्रुव ने भगवान की आराधना कर ध्रुव पद प्राप्त किया

जबकि सुरुचि के पुत्र उत्तम को कोई विशेष सफलता नहीं मिली

उन्होंने कहा—

आदर्श माताओं से ही आदर्श संतानों का जन्म होता है।

आज समाज को श्रेष्ठ संतानों की आवश्यकता है, जिसके लिए माता-पिता को संयमित जीवन अपनाना आवश्यक है।

कार्यक्रम के पूर्व गुरु-परंपरा अनुसार पादुका पूजन किया गया, जिसमें नारायण सेवा समिति के पदाधिकारियों एवं अनेक भक्तों ने भाग लेकर धर्मलाभ प्राप्त किया।

इस अवसर पर मुख्य यजमान देवमणि शुक्ला (मिर्जापुर) उपस्थित रहे। साथ ही काशीधर्मपीठ के निजी सचिव आनंद स्वरूप ब्रह्मचारी जी महाराज, एडवोकेट विनय तिवारी, मनोज मिश्रा, पंकज शास्त्री सहित अन्य श्रद्धालु भक्तगण उपस्थित रहे।

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