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ट्रांसजेंडर अधिकारों को कमजोर करने वाले ट्रांसजेंडर संशोधन बिल 2026 का बनारस में हुआ विरोध

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कृष्ण गोपाल की रिपोर्ट

आज दिनांक 27 मार्च 2026 को बनारस क्वियर-ट्रांस, किन्नर संगठन के माध्यम से संसद में प्रस्तावित ट्रांसजेंडर अधिकार संशोधन बिल 2026 पर बनारस के ट्रांस नागरिकों की विरोध और असहमति साझा की . ट्रांस समुदाय का कहना है कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर और जेंडर-डाइवर्स लोगों की गरिमा, स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करता है।

किन्नर समाज की सलमा चौधरी ने पत्रकारों से सवाल करते हुए अपनी बात रखी – बताइए आप किस लिंग के हैं ये आप तय करेंगे या मोदी सरकार? ऐसा कानून जो हमारी पहचान पर नियंत्रण करे, हम नहीं मानेंगे. हम सरकार से इस बिल प्रस्ताव को जल्द से जल्द रद्द करने की मांग करते हैं

क्वियर अधिकार कार्यकर्ता नीति ने बताया कि हम इस बिल का विरोध क्यों कर रहे हैं, –

1 . नागरिकों के संवैधानिक अधिकार और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के भी खिलाफ है यह विधेयक . यह बिल सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले National Legal Services Authority v. Union of India की अवहेलना करता है . कोर्ट ने कहा है कि हर व्यक्ति को अपनी जेंडर पहचान तय करने का अधिकार है . इस कथन को Navtej Singh Johar v. Union of India और Supriyo v. Union of India में भी दोहराया गया है। जबकि यह कानून ट्रांस नागरिकों को मेडिकल कमेटी के भरोसे और प्रशासनिक जांच के बाबुशाही वाले भ्रष्ट और उबाऊ चैनल से गुजरने को बाध्य करता है .

2 . विभिन्न ट्रांस पहचानों की उपेक्षा . विधेयक में ट्रांस व्यक्ति की परिभाषा धुंधली है . यह विधेयक कानून बना तो आशंका है कि कई ट्रांस लोगों—जैसे ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिलाएँ और अन्य नॉन-बाइनरी क्वीयर अपनी पहचान से वंचित हो जाएँगे .

3 . सहयोग खत्म हो जाएगा .

विधेयक कहता है कि “किसी को ट्रांसजेंडर बनने के लिए उकसाना अपराध है”. जबकि समाज में अपने घरो से बिछड़े हुए क्वीयर ट्रांस साथी एक दुसरे का सहयोग करके रहते आए हैं. इस कानून के बनने के बाद सहयोग करना अपराध माना जाएगा .

4 . अतंरराष्ट्रीय स्वास्थ्य मानकों की अनदेखी World Health Organization स्पष्ट रूप से मानता है कि जेंडर पहचान व्यक्ति की स्वयं के निर्णय और विवेक पर आधारित होती है, न कि केवल जैविक लिगं पर । हमारी संसद में प्रस्तावित बिल इस वैज्ञानिक और चिकित्सा सहमति को नजर अंदाज़ करता है।

5. हिंसा के मामलों में कमजोर सुरक्षा बिल में ट्रांस लोगों के खिलाफ होने वाली विभिन्न प्रकार की हिंसा को एक ही धारा में रखा गया है और सजा भी Bhartiya Nyay Sanhita में तय सजा से काफी कम रखी गई है।

6. ट्रांस अनुभवों को मिटाना यह बिल उन लोगों को नजर अंदाज कर रहा है.जो हार्मोन थेरेपी ले रहे हैं, क्रॉस-ड्रेसर हैं, या जिन्होंने सर्जरी करवाई है या नहीं करवाई है। इससे उनकी पहचान और वास्तविक अनुभवों को नकारा जाता है।

7. असमान सजा व्यवस्था ट्रांस लोगों के खिलाफ अपराधों पर कम सजा दी गई है, जबकि पहचान से जुड़े मामलों में कठोर सजा का प्रावधान है। इससे समदुाय का अपराधीकरण और कलंकित करने की शुरूवात होगी .

8. आरक्षण और कल्याण योजनाओं का अभाव बिल में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद ट्रांसजेंडर लोगों के लिए आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

9. जेंडर-अफर्मिंग हेल्थ केयर में बाधाएं आर्थिक रूप से कमजोर ट्रांस लोगों के लिए हार्मोन या सर्जरी जैसी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित नहीं की गई है। इस बिल की वजह से पहले से सीमित स्वास्थ्य सेवाएँ और कठिन हो सकती हैं।

10. समुदाय के सहयोग तंत्र पर खतरा इस बिल के कुछ प्रावधान समुदाय के सहयोग नेटवर्क, कार्यकर्ताओं और संगठनों (CBOs) को भी अपराधी बना सकते हैं।

11. शिक्षा और जागरूकता की कमी बिल में स्कूलों और विश्वविद्यालयों में जेंडर विविधता और ट्रांस पहचान के बारे में शिक्षा शामिल करने की कोई व्यवस्था नहीं है।

12. जेंडर पहचान का मेडिकलकरण व्यक्ति की आत्म-पहचान के बजाय मेडिकल जांच और प्रक्रियाओं को प्राथमिकता दी गई है।

13. सामाजिक वास्तविकताओं की अनदेखी परिवार से बहिष्कार, भेदभाव, रोजगार और शिक्षा में बाधाएँ—इन वास्तविक समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया गया है।

14. पहचान प्रमाणपत्र के लिए मेडिकल बोर्ड की बाध्यता यह प्रावधान आत्म-पहचान के अधिकार के खिलाफ है और NALSA फैसले का उल्लंघन करता है।

15. पारंपरिक और क्षेत्रीय समुदायों का बहिष्कार भारत के कई सामाजिक-सांस्कृतिक समुदायों को परिभाषा से बाहर रखा जा सकता है।

बोबी किन्नर ने अपील करते हैं कि ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को कमजोर करने वाले प्रस्तावित संशोधन के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठाएँ। ट्रांस पहचान पर नियंत्रण और भेदभावपूर्ण संशोधन का विरोध करें |

पहचान पर मेडिकल बोर्ड और डीएम का नियंत्रण ट्रांस पहचान पाने के लिए अब मेडिकल बोर्ड और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) की मंजूरी जरूरी बनाई जा रही है। पहचान देने से पहले शरीर की जांच (बॉडी स्क्रीनिंग) की बात की जा रही है। यह प्रक्रिया समुदाय के लिए शर्मनाक, डरावनी और अपमानजनक है।

वक्ता टीना किन्नर ने बताया कि कितना नुकसान होगा हमलोग को आइये जानते है बताया कि सिर्फ कुछ पारंपरिक पहचानों को ही मान्यता देने से संशोधन के अनुसार केवल किन्नर, जोगती, थिरुनंगई और हिजड़ा जैसी पहचान को ही “ट्रांसजेंडर” माना जाएगा। इससे कोठी और कई अन्य स्थानीय/पारंपरिक पहचानें खत्म या अमान्य हो सकती हैं। इसके अलावा, इन चार घराना परंपराओं से जुड़े लोग लगातार पुलिस और प्रशासन की निगरानी में रह सकते हैं, जिससे समुदाय की आज़ादी और अपनी पहचान तय करने का अधिकार कमजोर होगा।

सर्जरी को ही पहचान का आधार बनाना संशोधन में मेडिकल सर्जरी या लिंग परिवर्तन को ट्रांस पहचान का मुख्य प्रमाण माना जा रहा है। इससे उन लोगों के लिए खतरा बढ़ेगा जो बिना सर्जरी के अपनी ट्रांस पहचान में जीते हैं (जैसे अकुआ जननियाँ आदि)। साथ ही, अगर किसी डेरे में सर्जरी या हार्मोन से जुड़ी जानकारी सामने आती है, तो पूरे डेरे पर कार्रवाई का खतरा हो सकता है।

चांदनी किन्नर और बताया की कानून में किए गए ये सभी ठोस बदलाव भारत में ट्रांसजेंडर लोगों की पहले से ही मुश्किल ज़िंदगी को और ज़्यादा असुरक्षित और कठिन बना देते हैं, जिससे उनके लिए शिक्षा और रोज़गार तक पहुँच पाना भी मुश्किल हो जाता है। हमारे समुदाय की मांग है कि इन सभी संशोधनों को वापस लिया जाए और 2019 में भारत सरकार द्वारा पारित ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम को उसी रूप में बनाए रखा जाए।

हम उन तीन मुख्य तरह के महत्वपूर्ण संशोधनों की सूची दे रहे हैं, जो ट्रांसजेंडर लोगों के लिए नुकसानदायक होंगे:

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की सीमित तरीके से तय की गई परिभाषा:

“खुद अपनी पहचान तय करने के अधिकार” को खत्म करके, “ट्रांसजेंडर” की यह नई सीमित परिभाषा सभी ट्रांसजेंडर लोगों को मिलने वाली संवैधानिक सुरक्षा और मान्यता को छीन लेती है। यह परिभाषा 2019 के कानून में मान्यता प्राप्त ज्यादातर पहचानों—जैसे ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिलाएँ और नॉन-बाइनरी लोग—को उनके अधिकारों और कानूनी पहचान के दायरे से बाहर कर देती है।

यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के नालसा फैसले के खिलाफ है, जिसमें साफ कहा गया था कि “अपनी जेंडर पहचान चुनने का अधिकार, गरिमा के साथ जीने के अधिकार का हिस्सा है और इसलिए यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) के तहत आता है।” यह कदम पहले से ही हाशिये पर रह रहे ट्रांसजेंडर लोगों को और ज़्यादा अलग-थलग कर देगा और उनके लिए नागरिक अधिकार, शिक्षा और रोज़गार जैसे बुनियादी अधिकारों तक पहुँच पाना और मुश्किल बना देगा, जो कानूनी पहचान से जुड़े होते हैं।

मेडिकल प्रक्रियाओं की दख़लन रिपोर्टिंग:

अब बाइनरी जेंडर से जुड़ी सर्जरी करने वाले मेडिकल संस्थानों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे हर प्रक्रिया और मरीज़ की जानकारी राज्य को दें, और सर्जरी “करवाने वाले” व्यक्ति को भी ऐसा करना होगा। जबकि पहले यह केवल एक “विकल्प” था—जिससे ट्रांसजेंडर व्यक्ति चाहें तो अपनी कानूनी जेंडर पहचान में बदलाव करवा सकें। ये प्रावधान बहुत ज़्यादा हस्तक्षेप करने वाले हैं और मरीजों के निजता और अपनी पहचान तय करने के संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन करते हैं। इसके साथ ही, मेडिकल बोर्ड से जुड़ा नया प्रावधान—जिसमें सरकारी नियुक्त लोग शामिल होंगे—और ज़िला मजिस्ट्रेट की नई विस्तृत भूमिका के तहत वे अपनी इच्छा से अतिरिक्त मेडिकल राय मांग सकते हैं, जिसके गंभीर और नुकसानदायक प्रभाव हो सकते हैं। इससे हर वयस्क व्यक्ति के इलाज तक पहुँचने के बुनियादी अधिकार पर डर का असर पड़ेगा।

ऐसे कदम ज़रूरी नहीं हैं और न ही वैश्विक स्वास्थ्य मानकों के अनुरूप हैं। इससे 2019 के कानून के तहत मिली सुरक्षा भी कमज़ोर पड़ जाएगी।

परिवारों, देखभाल करने वालों और ट्रांसजेंडर समर्थन नेटवर्क का आपराधिककरण:

अधिनियम की धारा 18 में किए गए संशोधन में एक नया अपराध जोड़ा गया है, जिसमें “प्रेरित करना,” “लुभाना,” “धोखा देना,” “अतिरिक्त प्रभाव डालना या अन्य तरीके” जैसी व्यापक, अस्पष्ट और अपरिभाषित कार्रवाइयाँ शामिल हैं। यह समुदाय के खिलाफ गलत तरीके से अपहरण, लुभाने और जबरदस्ती ट्रांज़िशन करने के झूठे मामलों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे ट्रांसजेंडर व्यक्ति का समर्थन करने के लिए किए जाने वाले सभी जेंडर एफर्मिंग कार्य, और उनके समर्थन में लगे सभी व्यक्ति और समुदायिक ढाँचे—दोस्त, परिवार, स्वास्थ्य सेवा प्रदाता, सपोर्ट समूह, सहयोगी नियोक्ता और शैक्षिक संस्थान—आपराधिक रूप से शामिल किए जा सकते हैं। यह बिल भारत में जेंडर विविध समुदायों के खिलाफ औपनिवेशिक समय के रूढ़िवादी नज़रिए को दोबारा पेश करता है, जिसमें उन्हें बाल अपहरणकर्ता, जबरन ले जाने वाले और आदतन अपराधी दिखाया गया है

कार्यक्रम का संचालन करते हुए शहनकिन्नर ने एकजुटता की अपील करते हुए कि यह संशोधन समानता और गरिमा की दिशा में हुई प्रगति को पीछे ले जाता है। जो कानून सुरक्षा के लिए बनाए गए थे, उन्हें अधिकार सीमित करने का साधन नहीं बनना चाहिए इसलिए यह काला कानून सरकार वापस ले |

कोमल किन्नर ने अपील करते हुए कहा की इन सभी कारणों से हम आपसे अपील करते हैं कि इस मुद्दे की गंभीरता को समझें और इस भेदभावपूर्ण बिल का विरोध करें। अपनी आवाज़ उठाएं और ट्रांस समुदाय के सम्मान, पहचान और अधिकारों के साथ खड़े हों। हम सभी नागरिकों, क्वीयर समुदाय, सामाजिक संगठनों और साथियों से अपील करते हैं कि वे इस संशोधन के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाएँ।

हमारी पहचान किसी की अनुमति या जांच पर निर्भर नहीं है। आत्म-पहचान का अधिकार हमारा मौलिक अधिकार हैऔर हम इसकी रक्षा करेंगे।

हमारी मांगें ट्रांस बिल 2026 वापस लें |

काला कानून ट्रांस बिल 2026 वापस लें |

ट्रांस जेंडर एक्ट 2019 को सुधार कर संरक्षित करें |

कार्यकर्म में सक्रीय रूप से माही किन्नर, मोनिका किन्नर, अनामिका, रुमान, कृष्णा, हेतवी, सैम, कार्तिक, दक्ष, काजल किन्नर समेत सैकड़ो की संख्या में उपस्थित रहे |

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