खूबसूरत हैं न… पहचानते हैं यह कौन है.. नहीं.!तो ज़रा लौटिए 90 के दशक में। वह दौर जब सिनेमा में डर, धुआँ, हवेली, परछाईं और अचानक उभरती चुड़ैलें लोगों की रूह कंपा देती थीं। रामसे ब्रदर्स तब भूतिया फिल्मों के सुभाष घई हुआ करते थे, जिनका नाम आते ही लोग कहते थें वह कि भूतिया फिल्मों के बादशाह हैं।1988 में आई फ़िल्म ‘वीराना’ भी उसी परंपरा की देन थी और इसी फ़िल्म से जुड़ा यह चेहरा है जैस्मीन। हां, वही जैस्मीन, जिसने पर्दे पर चुड़ैल बनकर दर्शकों की नींद और होश दोनों उड़ा दिए थे। यह तस्वीर फ़िल्म के उसी मशहूर सीन की है, जब एक सुनसान सड़क पर जैस्मीन लिफ्ट मांगती है। कार वाला जनाब, हुस्न के आगे विवेक गिरवी रखकर, भीतर ही भीतर “गाबड़-गिल्ला” के सपने सजाते हुए कार रोक लेता है।कुछ ही दूरी तय होती है और तभी शुरू होता है असली सिनेमा जैस्मीन का चेहरा बदलता है, आंखों में वहशी चमक आती है, नकाब उतरता है और चुड़ैल अपने विकृत रूप में सामने आ जाती है। नतीजा वही, जो हर रामसे फ़िल्म में तय होता है खून, चीख और अंत। इस फ़िल्म की कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। सीख साफ है चुड़ैलें अक्सर बाहर से बहुत खूबसूरत होती हैं। जो पुरुष लार टपकाते हुए, बिना सोचे-समझे, उन्हें अपनी ज़िंदगी में ऐसी किसी औरत को “लिफ्ट” दे देता है, उसे उसका असली रूप देखने का मौका जब मिलता है तब तलक बहुत देर से हो चुकी होती है। और जब अक्ल आती है तब तक उसका खून चूसा जा चुका होता है आर्थिक मानसिक सामाजिक भी। इसलिए रील की दुनियां की जैस्मीन से सबक लीजिए रीयल दुनियां की जैस्मीनो से बचने में आसानी रहेगी।