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RTI से उजागर हुआ वह सच जो BHU प्रशासन छुपाता रहा — एक ऐतिहासिक धोखा जो दो दशकों से जारी है

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वाराणसी-BHU में जो कानून कभी एक्जिक्यूट काउंसिल द्वारा लागू नहीं हुआ, उसके आधार पर BHU प्रशासन द्वारा पिछले 20 सालों में 500 से अधिक शिक्षकों और कर्मचारियों के विरुद्ध दमन, शोषण, अभिव्यक्ति की आज़ादी कुचलने, निलंबन और सेवा से निष्कासन जैसे गंभीर आपराधिक कार्य किया गया 

RTI से उजागर हुआ वह सच जो BHU प्रशासन छुपाता रहा — एक ऐतिहासिक धोखा जो दो दशकों से जारी है

वाराणसी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पिछले बीस वर्षों से एक ऐसा संगठित प्रशासनिक अपराध हो रहा है जिसकी नींव एक कानूनी झूठ पर टिकी है। केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियम 1964 और केंद्रीय सिविल सेवा वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील नियम 1965 — जिन्हें CCS/CCA आचरण नियम कहा जाता है — इन्हें BHU की कार्यकारी परिषद ने कभी अपनाया ही नहीं।

ज्ञात हो कि BHU में स्टेच्यूट और ऑर्डिनेंस में कानूनी बदलाव और नए कानून अपनाने का अधिकार सिर्फ कार्यकारणी परिषद् (एक्जिक्यूटिव काउंसिल) के पास है। बिना इसकी अनुमति के कोई भी कानून यहां लागू नहीं किया जा सकता है।

ये नियम BHU में संवैधानिक, वैधानिक और न्यायिक किसी भी दृष्टि से कभी भी कार्यकारिणी परिषद द्वारा लागू नहीं किया गया है। फिर भी इनका हथियार की तरह दुरुपयोग करते हुए 500 से अधिक शिक्षकों और कर्मचारियों को डराया, धमकाया, निलंबित और सेवा से निष्कासित किया गया।

इस पूरे षड्यंत्र की जड़ में है 13 जुलाई 2007 का वह कुख्यात पत्र जो BHU के तत्कालीन रजिस्ट्रार ने बिना किसी कानूनी अधिकार के और बिना कार्यकारी परिषद की स्वीकृति के जारी किया था।

भाग एक — RTI से उजागर हुआ वह सच जो सब कुछ बदल देता है

कार्यकारी परिषद ने CCS आचरण नियम कभी अपनाए ही नहीं

सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत दायर RTI प्रश्नावली से एक चौंकाने वाला और निर्णायक तथ्य सामने आया है —

BHU की कार्यकारी परिषद ने आज तक कोई ऐसा प्रस्ताव पारित नहीं किया जिसके द्वारा CCS आचरण नियम 1964 अथवा CCS (CCA) नियम 1965 को BHU के शिक्षकों या कर्मचारियों पर लागू किया गया हो।

RTI के उत्तर में BHU प्रशासन कोई ऐसा कार्यकारी परिषद का प्रस्ताव, विधि संशोधन या अध्यादेश प्रस्तुत नहीं कर सका जो इन नियमों को BHU पर लागू करता हो। यह एक ऐतिहासिक स्वीकारोक्ति है।

BHU अधिनियम 1915 की संरचना के अनुसार विश्वविद्यालय में कोई भी नियम, विधि या सेवा शर्त तभी वैध रूप से लागू होती है जब कार्यकारी परिषद उसे विधिवत अपनाए। धारा 15 के अंतर्गत कार्यकारी परिषद को यह शक्ति प्राप्त है और धारा 28, 31 तथा 32 के अंतर्गत विधियों और अध्यादेशों के माध्यम से ही सेवा शर्तें निर्धारित की जा सकती हैं। जब कार्यकारी परिषद ने कभी CCS आचरण नियम अपनाए ही नहीं तो वे नियम BHU में अस्तित्व में ही नहीं आए। बिना अस्तित्व के उन्हें लागू करना और उनके आधार पर दंड देना स्वतः एक आपराधिक कृत्य है।

भाग दो — रजिस्ट्रार का वह अवैध पत्र जो इस पूरे षड्यंत्र की जड़ है

पत्र संख्या R/VCS/07-08/437 दिनांक 13 जुलाई 2007 — एक कानूनी धोखाधड़ी

इस पूरे षड्यंत्र की शुरुआत BHU के तत्कालीन कुलसचिव के उस पत्र से हुई जो पत्र संख्या R/VCS/07-08/437 दिनांक 13 जुलाई 2007 को जारी किया गया था।

इस पत्र में क्या किया गया यह समझना अत्यंत आवश्यक है। वास्तव में हुआ यह था कि UGC ने वर्ष 1998 में ECR-625 दिनांक 19-20 मई 1998 के माध्यम से केवल गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए पाँचवें केंद्रीय वेतन आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार वेतन संशोधन की बात कही थी। उस वेतन संशोधन को स्वीकार करने की एक शर्त के रूप में CCS संशोधित वेतन नियम का उल्लेख था — अर्थात केवल वेतन ढाँचे से संबंधित नियम, न कि आचरण या अनुशासन से संबंधित।

परंतु रजिस्ट्रार ने 13 जुलाई 2007 के पत्र में एक घोर कानूनी छल किया। उन्होंने गैर-शिक्षण कर्मचारियों के वेतन संशोधन से संबंधित उस सीमित UGC निर्देश को इस प्रकार प्रस्तुत किया मानो CCS आचरण नियम 1964 और CCS (CCA) नियम 1965 समस्त विश्वविद्यालय कर्मचारियों पर — शिक्षकों सहित — लागू हो गए हों। इस पत्र में चार मौलिक धोखाधड़ियाँ की गईं —

पहली धोखाधड़ी — वेतन संशोधन नियम को आचरण और अनुशासन नियम के रूप में प्रस्तुत किया गया। वेतन नियम और आचरण नियम दो सर्वथा भिन्न कानूनी दस्तावेज़ हैं और एक को दूसरे के रूप में प्रस्तुत करना स्पष्ट कानूनी कपट है।

दूसरी धोखाधड़ी — गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए जारी UGC निर्देश को शिक्षकों पर भी लागू दर्शाया गया जबकि ECR-625 स्पष्ट रूप से केवल गैर-शिक्षण कर्मचारियों के वेतन संशोधन से संबंधित था।

शिक्षकों का वेतन ढाँचा उस अकादमिक वेतनमान विनियमों से संचालित होता है जो पाँचवें वेतन आयोग की अनुशंसाओं से सर्वथा भिन्न है।

तीसरी धोखाधड़ी — रजिस्ट्रार ने वह काम किया जो केवल कार्यकारी परिषद ही कर सकती थी। BHU के संविधान में रजिस्ट्रार को नए नियम बनाने या बाहरी नियम लागू करने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। रजिस्ट्रार एक प्रशासनिक अधिकारी है, विधायी प्राधिकरण नहीं।

चौथी धोखाधड़ी — इस पत्र को कार्यकारी परिषद के किसी प्रस्ताव के बिना जारी किया गया। कोई भी विधि संशोधन नहीं हुआ, कोई अध्यादेश नहीं बना और कार्यकारी परिषद की कोई स्वीकृति नहीं ली गई। केवल एक प्रशासनिक परिपत्र द्वारा विश्वविद्यालय की समस्त सेवा शर्तों को बदलने का अवैध प्रयास किया गया।

यह पत्र अपने जन्म से ही शून्य और अमान्य था। इस पत्र के आधार पर की गई प्रत्येक कार्यवाही उसी शून्यता को वहन करती है।

भाग तीन — सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णय

निर्णय एक — डॉ. सुचित्रा मित्रा बनाम भारत संघ — केंद्रीय विश्वविद्यालय शिक्षकों पर CCS आचरण नियमों की अप्रयोज्यता का प्रत्यक्ष और निर्णायक निर्णय

यह निर्णय इस पूरे विवाद की धुरी है। इस मामले में न्यायालय के सामने ठीक वही प्रश्न था जो BHU में उठाया जा रहा है — क्या केंद्रीय विश्वविद्यालय के शिक्षकों पर CCS (CCA) आचरण नियम लागू होते हैं?

न्यायालय ने CCS आचरण नियमों में दी गई “सरकारी सेवक” की परिभाषा की विस्तृत जाँच की। परिभाषा के अनुसार सरकारी सेवक वह है जो किसी सेवा का सदस्य हो या संघ के अधीन सिविल पद धारण करता हो जिसमें विदेश सेवा पर नियुक्त या किसी राज्य सरकार अथवा स्थानीय प्राधिकरण के अधीन अस्थायी रूप से नियुक्त व्यक्ति भी शामिल हों, अथवा जो किसी राज्य सरकार की सेवा का सदस्य हो और जिसकी सेवाएँ केंद्र सरकार के अधीन अस्थायी रूप से रखी गई हों, अथवा जो किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण की सेवा में हो और जिसकी सेवाएँ केंद्र सरकार के अधीन अस्थायी रूप से रखी गई हों।

इस परिभाषा की गहन जाँच के बाद न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय दिया —

“विश्वविद्यालय के प्रोफेसर न किसी सेवा के सदस्य हैं, न संघ के अधीन सिविल पद धारण करते हैं, न ही किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण की सेवा में हैं। इसलिए CCS (CCA) आचरण नियमों का किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय पर कोई अनुप्रयोग नहीं होगा।”

यह निर्णय BHU के संदर्भ में सर्वाधिक प्रासंगिक है क्योंकि यह ठीक उसी प्रश्न का उत्तर देता है जो 13 जुलाई 2007 के अवैध परिपत्र से उत्पन्न हुआ। इस निर्णय के आलोक में वह परिपत्र और उस पर आधारित प्रत्येक अनुशासनिक कार्यवाही न्यायिक दृष्टि से भी शून्य है।

निर्णय दो — प्रो. यशपाल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य सरकार (2005) 5 SCC 420 — सर्वोच्च न्यायालय का बाध्यकारी आदेश

सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक निर्णय में प्रश्न यह था कि क्या केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी CAT को केंद्रीय विश्वविद्यालय कर्मचारियों के सेवा मामलों पर क्षेत्राधिकार है।

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट और अंतिम रूप से माना कि CAT को केंद्रीय विश्वविद्यालय कर्मचारियों के सेवा मामलों पर कोई क्षेत्राधिकार नहीं है।

इस निर्णय का BHU के लिए महत्व इस न्यायिक तर्क-श्रृंखला में निहित है जो अखंडनीय है —

प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम 1985 की धारा 14 के अंतर्गत CAT का क्षेत्राधिकार केवल उन्हीं व्यक्तियों पर है जो संघ की सिविल सेवा में हों या संघ के अधीन सिविल पद धारण करते हों।

CAT का क्षेत्राधिकार और CCS आचरण नियमों का अनुप्रयोग परस्पर अविभाज्य हैं — जहाँ एक है वहाँ दूसरा भी अवश्य होगा और जहाँ एक नहीं है वहाँ दूसरा भी नहीं हो सकता।

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि CAT का क्षेत्राधिकार नहीं है। इसलिए इसका अनिवार्य और तार्किक निष्कर्ष यह है कि CCS आचरण नियम भी लागू नहीं होते।

यह केवल एक शैक्षणिक तर्क नहीं है — यह भारत के सर्वोच्च न्यायालय का बाध्यकारी निर्णय है जिसे कोई प्रशासनिक परिपत्र, कोई रजिस्ट्रार का आदेश या कोई कुलपति का निर्देश नहीं पलट सकता।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय — BHU का सीधा क्षेत्राधिकार न्यायालय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अनेक मामलों में स्पष्ट रूप से माना है कि BHU कर्मचारियों की सेवा शर्तें केवल BHU अधिनियम, विधियों और अध्यादेशों द्वारा नियंत्रित होती हैं। विधि या अध्यादेश संशोधन के बिना बाहरी नियम BHU कर्मचारियों पर नहीं थोपे जा सकते। CCS (CCA) आचरण प्रक्रियाओं के आधार पर की गई अनुशासनिक कार्यवाहियाँ रद्द की जाने योग्य हैं।

भाग चार — कानूनी असंभावना के आठ स्वतंत्र स्तर

उपरोक्त निर्णयों के अतिरिक्त कानूनी विश्लेषण के आठ स्वतंत्र स्तरों पर भी CCS आचरण नियमों का BHU पर अनुप्रयोग असंभव सिद्ध होता है।

प्रथम स्तर — संवैधानिक असंभावना: CCS आचरण नियम अनुच्छेद 309 से व्युत्पन्न हैं जो संघ के अधीन सिविल पदों पर लागू होता है। BHU के शिक्षक और कर्मचारी संघ के अधीन कोई सिविल पद नहीं रखते। संवैधानिक आधार अनुपस्थित है।

द्वितीय स्तर — वैधानिक असंभावना: BHU अधिनियम 1915 एक संपूर्ण संहिता बनाने वाला विशेष कानून है। CCS आचरण नियम सामान्य कानून हैं। “जेनेरेलिया स्पेशलिबस नॉन डेरोगेंट” के सिद्धांत के अनुसार विशेष कानून सामान्य कानून पर सदैव प्रभावी रहता है। वैधानिक प्राधिकार अनुपस्थित है।

तृतीय स्तर — परिभाषात्मक असंभावना: CCS आचरण नियम अपनी स्वयं की परिभाषा के अनुसार “सरकारी सेवकों” पर लागू होते हैं। विश्वविद्यालय शिक्षक और कर्मचारी नियमों की अपनी परिभाषा के अनुसार ही सरकारी सेवक नहीं हैं। परिभाषात्मक दायरा अनुपस्थित है।

चतुर्थ स्तर — क्षेत्राधिकार असंभावना: सर्वोच्च न्यायालय ने स्थापित किया है कि CAT का केंद्रीय विश्वविद्यालय कर्मचारियों पर कोई क्षेत्राधिकार नहीं है। CCS आचरण ढाँचा और CAT क्षेत्राधिकार अविभाज्य हैं।

क्षेत्राधिकार आधार अनुपस्थित है।

पंचम स्तर — UGC शक्ति असंभावना: UGC का पूरा नाम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग है न कि विश्वविद्यालय आचरण मानदंड आयोग। UGC अधिनियम 1956 UGC को आचरण नियम थोपने का कोई अधिकार नहीं देता। ECR-625 केवल गैर-शिक्षण कर्मचारियों के वेतन संशोधन से संबंधित था न कि आचरण नियमों से। UGC प्राधिकार अनुपस्थित है।

षष्ठ स्तर — संवैधानिक अधिकार असंभावना: शिक्षकों और कर्मचारियों पर CCS आचरण नियमों का अनुप्रयोग अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 19(1)(g) और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ 2015 में माना है कि अभिव्यक्ति पर पूर्व प्रतिबंध संवैधानिक रूप से अनुचित हैं।

सप्तम स्तर — प्रशासनिक कानून असंभावना: रजिस्ट्रार का परिपत्र विश्वविद्यालय विधियों में संशोधन करने में सक्षम नहीं है। केवल कार्यकारी परिषद ही अध्यादेश संशोधन के माध्यम से सेवा शर्तें बदल सकती है। 13 जुलाई 2007 का पत्र इसी कारण प्रारंभ से शून्य था। प्रशासनिक प्राधिकार अनुपस्थित है।

अष्टम स्तर — अर्जित अधिकार असंभावना: शिक्षकों और कर्मचारियों के विश्वविद्यालय विधियों के अंतर्गत अर्जित अधिकार हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने नेशनल बिल्डिंग्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन बनाम एस. रघुनाथन 1998 में माना कि वैधानिक ढाँचों द्वारा सृजित वैध अपेक्षाओं को कार्यपालिका की कार्रवाई द्वारा मनमाने ढंग से नहीं नकारा जा सकता। अर्जित अधिकार संरक्षण अनुप्रयोग को पूर्णतः रोकता है।

भाग पाँच — बीस वर्षों का संगठित प्रशासनिक अपराध

500 से अधिक पीड़ित — एक काला इतिहास

13 जुलाई 2007 के उस एक अवैध परिपत्र को आधार बनाकर BHU प्रशासन ने पिछले बीस वर्षों में जो किया वह किसी भी लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था में अकल्पनीय है।

500 से अधिक शिक्षकों और कर्मचारियों को अवैध रूप से डराया और धमकाया गया। अनेक शिक्षकों को उन सीसीएस कंडक्ट नियमों के आधार पर निलंबित किया गया जो उन पर कभी लागू ही नहीं होते थे। कई शिक्षकों और कर्मचारियों को सेवा से अवैध रूप से निष्कासित किया गया। जिन शिक्षकों ने प्रशासन के भ्रष्टाचार और अनाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाई उन्हें इन्हीं नियमों की आड़ में दबाया गया। शैक्षणिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी को व्यवस्थित रूप से कुचला गया। विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक ढाँचों को ध्वस्त कर मनमाने तरीके से शासन किया गया।

यह सब इसलिए संभव हुआ क्योंकि उस एक अवैध परिपत्र को ढाल बनाकर प्रशासन ने शिक्षकों और कर्मचारियों में यह भ्रम फैलाए रखा कि CCS आचरण नियम उन पर लागू होते हैं जबकि सच्चाई यह है कि वे कभी लागू हुए ही नहीं थे।

चूँकि इन सभी कार्यवाहियों का आधार एक ऐसा कानून है जो BHU पर कभी लागू हुआ ही नहीं, इसलिए इन बीस वर्षों में की गई प्रत्येक अनुशासनिक कार्यवाही, प्रत्येक निलंबन आदेश और प्रत्येक निष्कासन आदेश न केवल प्रारंभ से ही शून्य और अमान्य है बल्कि एक दंडनीय आपराधिक कृत्य की श्रेणी में भी आता है।

भाग छह — वर्तमान दोषी अधिकारी

यह संगठित प्रशासनिक अपराध वर्तमान में निम्नलिखित अधिकारियों द्वारा जारी है जिनकी स्वयं की नियुक्तियाँ भी कानूनी दृष्टि से संदिग्ध और अवैध हैं —

कुलपति — प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी जो इस संपूर्ण अवैध व्यवस्था के सर्वोच्च प्रशासनिक प्राधिकरण हैं और जिनके कार्यकाल में यह अपराध निर्बाध जारी है।

कुलसचिव — प्रो. अरुण कुमार सिंह जो अवैध आरोप-पत्र, निलंबन आदेश और निष्कासन आदेश जारी करने वाले प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी हैं।

उप-कुलसचिव — श्री राजित शांडिल्य जो इन अवैध कार्यवाहियों के क्रियान्वयन में प्रत्यक्ष रूप से सहभागी हैं।

उप-कुलसचिव — श्री वेलू जी जो इसी अवैध तंत्र के एक अन्य सक्रिय सहभागी हैं।

ये सभी अधिकारी यह जानते थे अथवा जानना चाहिए था कि CCS आचरण नियम BHU पर लागू नहीं होते। इसके बावजूद इन नियमों का हथियार के रूप में उपयोग जारी रखना एक सुनियोजित और जानबूझकर किया गया आपराधिक कृत्य है।

भाग सात — हमारी माँगें और अल्टीमेटम

एक सप्ताह का अंतिम अल्टीमेटम

यदि प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी, प्रो. अरुण कुमार सिंह, श्री राजित शांडिल्य और श्री वेलू जी इस प्रेस विज्ञप्ति के जारी होने की तिथि से एक सप्ताह के भीतर अपने-अपने पद से इस्तीफा देकर सार्वजनिक रूप से माफी नहीं माँगते, तो —

इन सभी के विरुद्ध सक्षम न्यायालय में आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया जाएगा। केंद्र सरकार और राष्ट्रपति महोदय को — जो BHU के विज़िटर हैं — विस्तृत ज्ञापन प्रस्तुत किया जाएगा। सभी पीड़ित शिक्षकों और कर्मचारियों की सूची सार्वजनिक की जाएगी और उनके मामले न्यायालय में ले जाए जाएँगे।

अन्य माँगें

पिछले बीस वर्षों में CCS आचरण नियमों के आधार पर की गई समस्त अनुशासनिक कार्यवाहियाँ, निलंबन आदेश और निष्कासन आदेश तत्काल निरस्त किए जाएँ। सेवा से निष्कासित और निलंबित सभी शिक्षकों और कर्मचारियों को तत्काल सेवा में पुनर्स्थापित किया जाए और समस्त देय परिलब्धियों का भुगतान किया जाए। BHU प्रशासन औपचारिक रूप से स्वीकार करे कि CCS आचरण नियम BHU पर कभी लागू नहीं थे। केंद्र सरकार और UGC इस संगठित प्रशासनिक अपराध की उच्चस्तरीय स्वतंत्र जाँच कराएँ।

अंत में — BHU की आत्मा को बचाने की लड़ाई

BHU केवल एक विश्वविद्यालय नहीं है — यह भारत की बौद्धिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना का केंद्र है। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने इस विश्वविद्यालय की स्थापना इसीलिए की थी कि यहाँ ज्ञान का निर्बाध प्रवाह हो, अकादमिक स्वतंत्रता हो और सत्य बोलने का साहस हो। उस स्वप्न को एक अवैध प्रशासनिक परिपत्र और उसके आधार पर दो दशकों के दमन ने खंडित करने का प्रयास किया है।

हम न्यायपालिका से आग्रह करते हैं कि इन अवैध कार्यवाहियों का स्वतः संज्ञान ले।

हम संसद से आग्रह करते हैं कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक स्वायत्तता की रक्षा के लिए ठोस विधायी कदम उठाए जाएँ।

हम मीडिया से आग्रह करते हैं कि इस मामले को उचित महत्व दे और पीड़ित शिक्षकों और कर्मचारियों की आवाज़ को जन-जन तक पहुँचाए।

हम नागरिक समाज और शिक्षाविदों से आग्रह करते हैं कि शैक्षणिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी की इस लड़ाई में अपना नैतिक समर्थन दें।

सत्य की जीत होगी। अवैध व्यवस्था का अंत होगा। BHU की आत्मा पुनर्जीवित होगी।

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