कृष्ण गोपाल की रिपोर्ट
जमालपुर, दिनांक 29 मई, 2026.आल इंडिया आदिवासी कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया जी और आदिवासी कांग्रेस कमेटी, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष डा. उमेश चन्द्र जी के आह्वान पर आदिवासियों को *बनवासी* पहचान के अन्तर्गत समेटने की कोशिश के विरोध में *”आदिवासी विरोधी विचारधारा”* का प्रतिकात्मक पुतला दहनकिया जा रहा है। हम बनवासी नहीं, आदिवासी हैं, भारत देश के मूलनिवासी
हम यहाँ केवल विरोध करने नहीं आए हैं। हम अपनी पहचान, अपने अस्तित्व और अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एकत्रित हुए हैं।
*आदिवासी* शब्द केवल एक नाम नहीं है। यह हमारा इतिहास है, हमारी अस्मिता है, हमारी संस्कृति है और हमारा संवैधानिक अस्तित्व है। लेकिन भाजपा और आर एस एस हमें *बनवासी* कहकर हमारी पहचान सीमित करना चाहते हैं, क्यों?
क्योंकि यदि आदिवासियों को केवल जंगलों तक सीमित कर दिया जाएगा, तो जंगल खत्म होने के साथ हमारी पहचान भी मिट जाएगी।
जयपाल सिंह मुंडा जी ने संविधान सभा में *बनवासी* शब्द का विरोध किया था और उन्होंने तर्क दिया कि इन नामों ने आदिवासियों की गरिमा को कम किया, और उन्हें भारत के असली तथा मूल मालिक के रूप में मान्यता देने के बजाय, केवल जंगलों के निवासी तक सीमित कर दिया। उन्होंने ‘आदिवासी’ शब्द के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया, क्योंकि इसमें ऐतिहासिक वैधता थी और यह ज़मीन पर उनके पारंपरिक अधिकार को रेखांकित करता था।एक तरफ ये लोग आदिवासी संस्कृति की बातें करते हुए मंचों पर आदिवासी नृत्य दिखाते हैं और दूसरी तरफ आदिवासियों की जमीनों को कारपोरेट को सौपते जाते हैं। हसदेव अरण्य, सिंगरौली, सिजिमाली, अरावली और अंडमान निकोबार का जंगल उदाहरण है। भाजपा का आदिवासियों से प्रेम केवल दिखावा है, उनकी नजरें वास्तव में आदिवासी क्षेत्रों के जल, जंगल, जमीन और खनीजों पर टिकी हैं।
आज हम चेतावनी देने आएं हैं-
हमारी पहचान, हमारा इतिहास, हमारी संस्कृति और विरासत को बदलने की कोशिश बन्द करो।
हम बिरसा मुंडा जी के संघर्ष के उत्तराधिकारी हैं, हम जयपाल सिंह मुंडा जी के विचारों के वारिस हैं।
*न जंगल कटने देंगे, न आदिवासियों को बंटने देंगे।*
जय जोहार, जय आदिवासी, जय भारत, जय संविधान। जिला अध्यक्ष.रामचंद्र गोंड आदिवासी कांग्रेस जिला कमेटी. श्यामलाल गोंड गोविंद गोंड राधे. गोंड . हीरालाल गोंड. नवमी गोंड आदि लोग उपस्थित रहे