देख दिनन के फेर… यह कहावत इन दो तस्वीरों पर हूबहू फिट बैठती है। ऊपर वाली तस्वीर उस दौर की ह जब प्रदेश में सपा की सरकार थी, और नीचे वाली तस्वीर आज यानी बीजेपी शासनकाल की। दोनों ही फ्रेम में एक ही शख्स नज़र आ रहे हैं, लेकिन हालात और व्यवहार का अंतर साफ़ दिख जाता है। यह कहानी सिर्फ अमिताभ ठाकुर की नहीं, बल्कि उस सच्चाई की भी है जो अक्सर सत्ता के बदलते ही बदल जाती है।मैं यह दावा नहीं करता कि अमिताभ ठाकुर पूरी तरह निर्दोष या दूध के धुले होंगे। क्योंकि हर इंसान की अपनी सीमाएँ और गलतियाँ होती हैं। परंतु जो व्यवहार उनके साथ इस सरकार में होता आया है, वह किसी भी लोकतांत्रिक सोच रखने वाले नागरिक को चुभता जरूर है। बहुमत की सरकारें अक्सर मदांध हो जाती हैं यह इतिहास भी कहता है और वर्तमान भी। सत्ता को अपने खिलाफ उठती आवाज हमेशा खटकती है, और फिर हर तरह के हथकंडे अपनाकर आवाज दबाने की कोशिश की जाती है।यही वजह है कि हमारे समाज में व्हिसलब्लोअर होना अपने आप में जोखिम है। सच बोलने वाले को सम्मान कम और प्रताड़ना ज्यादा मिलती है। और जो व्यवस्था सच्चाई कहने वालों को चुप कराने पर उतारू हो जाए, वह लोकतंत्र नहीं, अघोषित राजतंत्र की राह पर चल पड़ी होती है।लोकतंत्र की खूबसूरती इसकी असहमति में है। शासक से सवाल पूछना, नीतियों पर उंगली उठाना, निर्णयों का विरोध करना यह अधिकार हमें संविधान ने दिए हैं। लेकिन जब सत्ता असहमति को अपराध समझने लगे, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था राजा–प्रजा वाली मानसिकता की ओर बढ़ रही है।यह मामला हमें चेतावनी देता है कि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव से नहीं चलता, बल्कि उससे भी ज्यादा जरूरी है उसका माहौल जहाँ डर नहीं, संवाद हो जहाँ सवाल पूछने पर कार्रवाई नहीं, जवाब मिले। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम सत्ता से ज़्यादा लोकतंत्र के साथ खड़े हों, वरना आवाज़ें मौन कर दी जाएंगी और सिस्टम एकतरफा हो जाएगा और तानाशाही झेलना हमारी किस्मत में लिख जाएगा।