पूजा भारद्वाज की रिपोर्ट
काशी की गलियों से लेकर देश के हर थाने तक, जब आम आदमी रात को चैन की नींद सोता है, तब पुलिसकर्मी सड़कों पर डटे रहते हैं। लेकिन क्या हम कभी सोचते हैं कि ये वर्दीधारी जवान भी इंसान हैं? उनके भी दिल-दिमाग हैं, परिवार हैं और सबसे बड़ी बात—उनके शरीर भी थकान, तनाव और बीमारियों की मार झेल रहे हैं।_
_आज की तेज़-रफ्तार ज़िंदगी में अपराध, भीड़-भाड़ और राजनीतिक दबाव के बीच पुलिस महकमा 24 घंटे अलर्ट रहता है, लेकिन इस अनवरत सेवा का भारी खामियाज़ा इनके स्वास्थ्य को उठाना पड़ रहा है।भारतीय पुलिस की स्थिति पर किए गए अनेक अध्ययनों से साफ़ ज़ाहिर है कि ज्यादातर पुलिसकर्मी निर्धारित काम के घंटों से कहीं ज्यादा ड्यूटी करते हैं। औसतन 12 से 14 घंटे, कभी-कभी लगातार दो शिफ्ट्स बिना आराम के। कोई फिक्स्ड वर्किंग ऑवर्स नहीं, कोई नियमित वीकली ऑफ नहीं। रात की ड्यूटी, सुबह की पेट्रोलिंग, फिर दिन भर की जाँच-पड़ताल—यह चक्र चलता रहता है। नतीजा? नींद की कमी, अनियमित भोजन और लगातार थकान। चिड़चिड़ापन बढ़ता जाता है। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना, परिवार के साथ समय न बिताना पाना और लगातार तनाव इनका साथी बन चुका है_
_स्वास्थ्य विशेषज्ञों और विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय पुलिसकर्मियों में उच्च रक्तचाप (बीपी) और डायबिटीज (शुगर) की समस्या आम हो गई है। एक अध्ययन में पाया गया कि बिना किसी पूर्व इतिहास वाले पुलिसकर्मियों में भी करीब 48-50 प्रतिशत को उच्च रक्तचाप की शिकायत है, जबकि शुगर की समस्या भी बढ़ रही है। काम का तनाव कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ाता है, जो ब्लड शुगर को असंतुलित करता है। लंबे घंटों की ड्यूटी, अनियमित नींद और तनावपूर्ण माहौल टाइप-2 डायबिटीज का खतरा दोगुना कर देते हैं। मोटापा, पेट की चर्बी, कम शारीरिक गतिविधि और तनावपूर्ण जीवनशैली इन समस्याओं को और बढ़ा रही है।न सिर्फ शारीरिक, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य भी चिंता का विषय है।_
_ऑक्यूपेशनल स्ट्रेस के कारण पुलिसकर्मियों में डिप्रेशन, एंग्जायटी और बर्नआउट के मामले बढ़ रहे हैं। कई अध्ययनों में 70-80 प्रतिशत पुलिसकर्मी उच्च स्तर का तनाव महसूस करते हैं। राजनीतिक दखल, ऊपरी अधिकारियों का दबाव और परिवार से दूर रहना इनके तनाव के प्रमुख कारण हैं। नतीजतन, चिड़चिड़ापन आम हो गया है।
_समाधान क्या है? सबसे पहले तो पुलिस फोर्स में पर्याप्त भर्ती कर स्टाफिंग सुधारना जरूरी है, ताकि ड्यूटी घंटे सीमित किए जा सकें। नियमित स्वास्थ्य जांच शिविर, योग-ध्यान और तनाव प्रबंधन कार्यक्रम चलाए जाएं। परिवार के साथ समय बिताने के लिए वीकली ऑफ और लीव पॉलिसी को सख्ती से लागू किया जाए। आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर प्रशासनिक कामों को कम किया जा सकता है, ताकि जवान फील्ड वर्क पर फोकस कर सके।_
*पुलिस हमारी सुरक्षा की पहली कड़ी है। अगर वे स्वस्थ और प्रसन्न नहीं होंगे, तो समाज की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? समय आ गया है कि हम ‘पुलिसवालों को भी दर्द होता है’ इस सच्चाई को स्वीकार करें और उनके कल्याण के लिए ठोस कदम उठाएं। वर्दी की इज्जत तभी सच्ची होगी, जब हम उस वर्दी को पहनने वालों की सेहत और मानसिक शांति का भी ख्याल रखा जायेगा।*