वाराणसी काशी दीप विजन । काशी की गलियों में जहां शिव की भक्ति जीवन और मृत्यु के पार मुक्ति का मार्ग दिखाती है, वहीं भदैनी के लोलार्क कुंड की सीढ़ियों पर उतरती आस्था में जीवन की नई कोंपल की कामना भी दिखाई देती है। केदारखंड स्थित लोलार्क कुंड में सूर्य षष्ठी के अवसर पर स्नान और लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन-पूजन से संतान की प्राप्ति होने की धार्मिक मान्यता है।
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की षष्ठी को सूर्य षष्ठी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य की किरणें अपनी विशेष ऊर्जा के साथ कुंड के जल को स्पर्श करती हैं। इसी आस्था के चलते पति-पत्नी कुंड में स्नान कर संतान प्राप्ति की कामना करते हैं। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इस दिन का स्नान विशेष फलदायी माना गया है। इस अवसर पर श्रद्धालु मौसमी फल-सब्जियों, विशेषकर कोहड़ा और लौकी का दान कर उन्हें कुंड में अर्पित करते हैं।
रामयश मिश्र के अनुसार महाभारतकालीन मान्यताओं में भी सूर्य उपासना और संतान प्राप्ति का उल्लेख मिलता है। उनका कहना है कि कुंती को भगवान सूर्य की कृपा से पांडव जैसे पुत्र प्राप्त हुए थे। इस बार भाद्रपद शुक्ल षष्ठी गुरुवार, 17 सितंबर को पड़ रही है, जिसके चलते लोलार्क कुंड में हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने और आस्था की डुबकी लगाने की परंपरा निभाई जा रही है। काशी की यह परंपरा आज भी विश्वास, सूर्योपासना और मातृत्व की कामना को एक ही जलधारा में समेटे हुए है।