काशी दीप विजन राष्ट्रीय हिंदी समाचार पत्र
लेखक: ए.के. बिंदूसर (संस्थापक, भारतीय मीडिया फाउंडेशन – नेशनल कोर कमेटी)
किसी भी लोकतंत्र में ‘पुलिस’ सुरक्षा और विश्वास का प्रतीक होती है। छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों से प्राप्त सूचनाएं और जमीनी फीडबैक एक अत्यंत गंभीर चिंता की ओर इशारा कर रहे हैं। भारतीय मीडिया फाउंडेशन (नेशनल) की कोर कमेटी ने उस स्थिति का विश्लेषण किया है, जहाँ कभी-कभी ‘गुड वर्क’ (सराहनीय कार्य) के आंकड़ों की होड़ में निर्दोष युवाओं को गंभीर कानूनी जाल में फंसाए जाने के मामले सामने आ रहे हैं।
यह लेख किसी संस्था या विभाग के प्रति द्वेष नहीं, बल्कि ‘पुलिसिंग’ व्यवस्था में सुधार और आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक विमर्श है।
’गुड वर्क’ बनाम मानवीय संवेदनाएं
पुलिसिंग में कार्यकुशलता और अपराध नियंत्रण अनिवार्य है, परंतु जब ‘आंकड़ों का दबाव’ निर्दोष नागरिकों के व्यक्तिगत जीवन और करियर पर भारी पड़ने लगे, तो उस पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है। एनडीपीएस (NDPS) एक्ट जैसे कठोर कानूनों का दुरुपयोग कर युवाओं को फर्जी बरामदगी में फंसाना न केवल एक कानूनी त्रुटि है, बल्कि यह एक युवा के भविष्य और उसके परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए अपूरणीय क्षति है।
भारतीय मीडिया फाउंडेशन (नेशनल )की सुधारवादी मांगें,
हमारा उद्देश्य प्रशासन के साथ मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाना है, जहाँ कानून का दुरुपयोग शून्य हो। इस दिशा में हम निम्नलिखित सुधारों के कार्यान्वयन हेतु प्रशासन का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं:
द्वेषपूर्ण अभियोजन (Malicious Prosecution) पर सख्त नीति: जो भी अधिकारी पद का दुरुपयोग करते हुए जानबूझकर झूठे साक्ष्य गढ़ते हैं, उनके विरुद्ध कठोर विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। ऐसी स्थितियों में पीड़ित को दी जाने वाली क्षतिपूर्ति का एक हिस्सा संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय करते हुए वसूला जाना चाहिए।
डिजिटल साक्ष्य की अनिवार्यता: पारदर्शी कार्यप्रणाली के लिए बरामदगी के समय बॉडी-कैम या सीसीटीवी फुटेज की अनिवार्यता हो। डिजिटल साक्ष्य के अभाव में की गई बरामदगी को न्यायिक प्रक्रिया में संदिग्ध माना जाना चाहिए।
स्वतंत्र निगरानी समितियों का गठन: प्रत्येक जिले में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, प्रबुद्ध नागरिकों और मीडिया प्रतिनिधियों की एक ‘स्वतंत्र निगरानी समिति’ गठित की जाए। विशेषकर एनडीपीएस मामलों में साक्ष्यों का प्राथमिक सत्यापन इस समिति के संज्ञान के बाद ही आगे बढ़ाया जाए।
बरामदगी का विशेष ऑडिट: जिन थानों में एनडीपीएस एक्ट के तहत मामलों की संख्या असामान्य है, वहां पिछले 5 वर्षों के मामलों का एक विशेष ऑडिट टीम द्वारा निष्पक्ष परीक्षण किया जाए।
कानूनी संरक्षण का अधिकार: नागरिकों को तलाशी के दौरान स्वतंत्र गवाहों (जैसे स्थानीय पार्षद, ग्राम प्रधान या प्रतिष्ठित नागरिक) की उपस्थिति की मांग करने का पूर्ण अधिकार हो।
सामूहिक उत्तरदायित्व की ओर
हमारा प्रशासन से विनम्र आग्रह है कि इस विषय को व्यवस्था सुधार के एक अवसर के रूप में देखा जाए। भारतीय मीडिया फाउंडेशन हर जिले में एक ‘लीगल एड सेल’ सक्रिय कर रहा है, ताकि कानूनी प्रक्रिया से अनभिज्ञ युवाओं को समय पर न्याय मिल सके।
युवाओं के लिए सुझाव: कानून का पालन करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। किसी भी अप्रिय स्थिति में धैर्य बनाए रखें, नियमानुसार स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने का आग्रह करें और डिजिटल माध्यमों (जैसे कैमरा) से साक्ष्य सुरक्षित रखें। आपकी जागरूकता ही किसी भी अनैतिक प्रक्रिया को रोकने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
हमारा मानना है कि एक संवेदनशील और पारदर्शी पुलिस प्रशासन ही राष्ट्र की असली शक्ति है। आइए, मिलकर एक ऐसी कार्यसंस्कृति विकसित करें जहाँ हर नागरिक स्वयं को सुरक्षित महसूस करे और न्याय प्रणाली पर अटूट विश्वास बना रहे।
भारतीय मीडिया फाउंडेशन (नेशनल )का ध्येय: सूचना, न्याय और जन-जागरूकता।