*महंगी पढ़ाई और दवाई से दम तोड़ती आम आदमी की हसरतें*
*नकली सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने को कर्ज के जाल में डूबता जा रहा है भारत का मध्यम वर्ग
भारत का मिडिल क्लास आज एक अनकही त्रासदी का शिकार है। वह न तो पूरी तरह गरीब है, न अमीर—पर उसकी जिंदगी दोनों के बीच की संकरी गली में फंसी हुई लगती है। जहां एक तरफ सपने हैं—बच्चों को अच्छी शिक्षा, परिवार को सुरक्षित स्वास्थ्य, घर में थोड़ी-सी सुकून भरी जिंदगी—वहीं दूसरी तरफ हकीकत है महंगाई की मार, शिक्षा-स्वास्थ्य की आसमान छूती कीमतें और नकली सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने की जद्दोजहद।
एक साधारण मिडिल क्लास परिवार। पिता सरकारी नौकरी या प्राइवेट सेक्टर में मध्यम वेतन पर गुजारा करते हैं। मां घर संभालती हैं, बच्चों की पढ़ाई का बोझ उठाती हैं। बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ते हैं, क्योंकि “समाज में इज्जत” का सवाल है। लेकिन हर महीने फीस का बिल आता है—10-15 हजार से शुरू होकर इंजीनियरिंग-मेडिकल कॉलेज में लाखों तक पहुंच जाता है। कोचिंग, ट्यूशन, एंट्रेंस की तैयारी—सब मिलाकर शिक्षा अब सपना नहीं, बोझ बन चुकी है।
भारत में शिक्षा पर प्रति छात्र खर्च निजी क्षेत्र में सरकारी से कई गुना ज्यादा है, और अधिकांश मिडिल क्लास परिवार इसी निजी शिक्षा पर निर्भर हैं। नतीजा? बचत खत्म, लोन लेना पड़ता है, और बच्चे पढ़ाई पूरी होने से पहले ही कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।
फिर आती है दवाई की बारी। कोई बुजुर्ग माता-पिता बीमार पड़ते हैं, या खुद कोई गंभीर बीमारी—अस्पताल का बिल लाखों में निकल आता है। सरकारी अस्पतालों में सुविधा कम और भीड़ बहुत अधिक है और प्राइवेट में बेहद इलाज महंगा।
मेडिकल इमरजेंसी में परिवार या तो कर्ज लेता है, या इलाज छोड़ देता है। कई बार मौत की वजह इलाज न मिलना नहीं, बल्कि इलाज का खर्च न उठा पाना होता है। मिडिल क्लास का आदमी न तो आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का पूरा लाभ उठा पाता है, न ही प्राइवेट इंश्योरेंस का बोझ उठा पाता है। नतीजा—सपने दम तोड़ते हैं, हसरतें कब्र में दफन हो जाती हैं।
इसके बीच चल रही है एक और जंग—नकली सामाजिक प्रतिष्ठा की। पड़ोस में कोई नई कार ले आया, तो “हम भी पीछे नहीं रहेंगे”। बच्चे अच्छे स्कूल में नहीं पढ़े तो “लोग क्या कहेंगे”। शादी में दिखावा, त्योहारों में महंगे गिफ्ट—ये सब मिडिल क्लास को अंदर से खोखला कर रहा है।
असल में यह प्रतिष्ठा नहीं, एक भ्रम है—जिसे बनाए रखने के लिए EMI पर कार, लोन पर फोन, क्रेडिट कार्ड पर खर्च। नतीजा? तनाव, डिप्रेशन, और परिवार में झगड़े।
मिडिल क्लास अब “सर्वाइवल मोड” में जी रहा है—सपनों को छोड़कर सिर्फ जीवित रहने की कोशिश में है।
आम आदमी की हसरतें अब सिर्फ जीने की नहीं, सम्मान से जीने की हैं। लेकिन महंगी पढ़ाई और दवाई ने उन हसरतों को दम तोड़ दिया है। क्या यह भारत की विकास गाथा का सच है—जहां कुछ लोग आसमान छू रहे हैं, और लाखों मिडिल क्लास वाले बस जीने की जद्दोजहद में लगे हैं ?