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हिदुस्तानी एकेडेमी प्रयागराज एवं पूर्णोदय महिला महाविद्यालय वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आज महाविद्यालय सभागार में *मध्यकालीन नारी अस्मिता

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कार्यालय प्रतिनिधि की रिपोर्ट वाराणसी

हिदुस्तानी एकेडेमी प्रयागराज एवं पूर्णोदय महिला महाविद्यालय वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आज महाविद्यालय सभागार में *मध्यकालीन नारी अस्मिताऔर मीराबाई* विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में आये समस्त वक्ताओं तथा मुख्य अतिथि का स्वागत कार्यक्रम के संयोजक एवं सरंक्षक डा. अनिल तिवारी ने अंगवस्त्र, पूष्पगुच्छ प्रदान करते हुए किया।  *मध्यकालीन नारी अस्मिता और मीराबाई** एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के *मुख्य अतिथि डॉ उदय प्रताप सिंह (पूर्व अध्यक्ष हिंदुस्तानी अकादमी प्रयागराज)* ने कहा, मध्यकालीन नारी अस्मिता की चर्चा जब भी होती है, मीराबाई का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। मीरा केवल कृष्ण की भक्त नहीं थीं, बल्कि वह मध्यकालीन समाज में स्त्री की स्वतंत्र चेतना की एक महत्वपूर्ण आवाज भी थीं। उन्होंने अपने जीवन और काव्य के माध्यम से यह स्थापित किया कि स्त्री की पहचान केवल उसके परिवार, पति या कुल से निर्धारित नहीं होती। उसका अपना मन, अपनी आस्था, अपनी चेतना और अपना निर्णय भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मीरा के जीवन को देखें तो वह राजघराने से आती थीं। उनके सामने वैभव था, प्रतिष्ठा थी और राजपरिवार की कठोर मर्यादाएं थीं। लेकिन मीरा ने अपनी आत्मिक स्वतंत्रता को इन सामाजिक सीमाओं से ऊपर रखा। उनके लिए कृष्ण केवल आराध्य नहीं थे, बल्कि जीवन का केंद्र थे। यही कारण है कि उनके काव्य में प्रेम और भक्ति के साथ-साथ आत्मसम्मान और स्वतंत्र अस्तित्व की अनुभूति भी दिखाई देती है। मीरा का प्रसिद्ध भाव है

 

 

“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।”

यह पंक्ति केवल भक्ति की अभिव्यक्ति नहीं है। इसे स्त्री की आत्म-अभिव्यक्ति के रूप में भी देखा जा सकता है। मीरा यहां अपने जीवन का केंद्र स्वयं निर्धारित करती हैं। वह कहती हैं कि मेरी आस्था, मेरा प्रेम और मेरी पहचान मेरी अपनी है। यह उस समय के सामाजिक ढांचे में एक असाधारण आत्मविश्वास था। मध्यकालीन समाज में स्त्री के लिए निर्धारित भूमिकाएं बहुत सीमित थीं। परिवार और कुल की प्रतिष्ठा को स्त्री के आचरण से जोड़ा जाता था। ऐसे वातावरण में मीरा का साधु-संतों के बीच जाना, सार्वजनिक रूप से भक्ति करना और अपने आराध्य के प्रति प्रेम को निर्भीकता से व्यक्त करना सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देने जैसा था।

मुख्य वक्ता जेएनयू के प्रो, ओम प्रकाश सिंह* ने कहा कि मीरा की चुनौती किसी राजनीतिक विद्रोह के रूप में नहीं थी। उनका प्रतिरोध आध्यात्मिक और मानवीय था। उन्होंने तलवार नहीं उठाई, लेकिन अपनी आवाज को दबने नहीं दिया। यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी।

कार्यक्रम में प्रमुख रुप से उपस्थित प्रो. मनोज कुमार सिंह, श्री नरेंद्र नाथ मिश्र, प्रो. देवब्रत चौबे, प्रो. राधेश्याम सिंह, श्री अंजनी कुमार सिंह, डा सदानन्द सिंह, डा. प्रीति त्रिपाठी, प्रो. सर्वेश पाण्डेय एव. प्रो. सुचिता त्रिपाठी ने अपने विचार वक्त किये. इसीक्रम में प्रतिभागी, शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थीयों ने अपने शोध पत्र वाचन किये।

कार्यक्रम के अंत में कविगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें श्री अशोक कुमार सिंस, श्रु बृजेश पाण्डेय, श्री देवेन्द्र पाण्डेय, श्री कंचन सिंह परिहार, श्री संतोष कुमार सिंह, श्री प्रसन्न बदन चतुर्वेदी, श्री बृजेन्द्र नारायण द्विवेदी ने कवि पाठ्य किया।

इससे पूर्व महाविद्यालय की मनोविज्ञान की प्रवक्ता डा वन्दना वर्मा द्वारा लिखित पुस्तक *मनोवैज्ञानिक परीक्षण* का लोकार्पण किया गया।

कार्यक्रम का संचालन डा बिंदु पटेल तथा डा पूजा सिंह ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन महाविद्यालय की प्राचार्या डा साधना श्रीवास्तव ने दिया। इस दौरान महाविद्यालय के सम्मानित डा नरेंद्र देव, डा प्रीति पाण्डेय, डा शिरीष प्रियदर्शी, डा रेनू पाण्डेय, डा श्रीनित्या मालवीय, श्री सुशील सिंह, श्री अमरनाथ सिंह, डा अर्चना पाण्डेय डा नमिता साहू इत्यादी एवं छात्राएं प्रमुखरुप से उपस्थित रही।

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