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मऊ पुलिस के इस कृत्य की कड़ी निंदा करता हूँ। भई इस बंदे को बख्श दिया

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मैं मऊ पुलिस के इस कृत्य की कड़ी निंदा करता हूँ। भई इस बंदे को बख्श दिय जाना चाहिए था, खामखा ईसे रेल बना दिया । एक तो बेचारा गंभीर बीमारी का मारा, ऊपर से अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड की तलाश में भटक रहा था।

 

अब यह कोई छुपी बात तो है नहीं कि सरकारी नौकरी और खासकर वर्दी का युवतियों में अलग ही क्रेज होता है, बस उसी क्रेज को भुनाने वह निकल पड़ा था।

 

मगर सनम मिलने से पहले ही मऊ पुलिस ने पूरा सीन क्रिएट कर दिया, ऐसा सिनेमा बनाया कि हीरो बनने से पहले ही विलेन घोषित कर दिया गया।

 

जाओ पुलिस वालों, तुम्हें इसकी हाय लगेगी। अगर मऊ कप्तान हमारे परिचित होते तो अब तक दो बेर उनसे इस बेचारे के हक में बहसिया चुके होते कि भई आखिर इसका कसूर क्या है। हो सकता है यह भी मेरी ही तरह वर्दी की मोहब्बत का मारा हो। वर्दी को तरसते बदन को राहत-ए-मुकाम देने के लिए फर्जी बनना ही आख़िरी सहारा हो।

 

सुनो भाई फर्जी डीएसपी प्रभात पांडेय, एक बात गांठ बाँध लो देखने में यह वर्दी भले ही बड़ी आकर्षक लगती हो, मगर हकीकत में यह वर्दी बड़ी बेदर्द होती है।

यह सुकून खा जाती है, साथ खा जाती है, संबंध और संबल सब निगल जाती है।

 

जब वर्दी उतारने की बारी आती है तब तक ज़िंदगी का एक बेहद ज़रूरी हिस्सा कब का निकल चुका होता है। तकरीबन हर वर्दीधारी का हाल बेहाल होता है और सुकून के मामले में वह दूसरे सरकारी विभागों के अफसरों से कहीं ज़्यादा कंगाल निकलता है। हाँ, यह भी सच है और मैं इसे मानता हूँ कि वर्दी कई बार वरदान सरीखी भी होती है, जिसे बदन पर आ जाए उसकी गरिमा और व्यक्तित्व में चार चाँद लगा देती है।

और हां मेरा एक दुख और नोट कर लो एक वर्दीवाला भविष्य में पत्रकार बन सकता है, मगर एक पत्रकार भविष्य में वर्दीवाला नहीं बन सकता और जब जबरन बनने की कोशिश करेगा तो इस भाई की तरह पकड़ा जाएगा। फिर वही पत्रकार उसे फर्जी वर्दीधारी लिखकर खबर भी चला देगा। बहरहाल इस भाई को न खुदा मिला न विसाल-ए-सनम, यही दुख मुझे भीतर तक सता रहा है। इसे देखकर मेरा भी वर्दी-प्रेम दुबककर रजाई में घुसकर लुका रहा है

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