अपना देश अंधश्रद्धा और अंधविश्वास में उत्सवधर्मिता का आईकॉन है। यहां अधिकांश लोग तर्क और विज्ञान की जगह चमत्कार को नमस्कारकरने में विश्वास रखते हैं और माउथ टू माउथ प्रचार को ही परम सत्य मान लेते हैं। कभी भगवान की मूर्तियों को दूध पिलाने के नाम पर भीड़ उमड़ पड़ती है, तो कभी कोई औऱ चमत्कार। एक बार किसी व्यक्ति ने यह कह दिया था कि फलां तारीख को नागिन उससे ब्याह करेगी तो उस दिन देखने वालों की भयानक भीड़ जुट गई थी। भारत शायद इकलौता देश है जहां चेचक जैसी बीमारी को माता माई का दर्जा मिला और कुछ जगहों पर वैश्विक महामारी कोरोना भी इसी उपाधि से नवाजी गई।बहरहाल ताजा मामला बिजनौर का है, जहां एक कुत्ता मंदिर में भगवान की मूर्तियों की परिक्रमा करके एक जगह शांत बैठ गया। इसके बाद क्या था उसके दर्शन होने लगे, पैर छूकर आशीर्वाद लेने की होड़ मच गई है। अंधश्रद्धा और उत्सवधर्मिता का आलम यह है कि दूर-दूर से लोग उसे देखने और आशीर्वाद लेने उमड़ पड़े हैं। आसपास दुकानें सज गई हैं, भीड़ है, उत्सव है और समझाने का कोई फायदा नहीं।हकीकत यह है कि भारत में अगर एक-दो मामूली चमत्कार किसी के काबू में आ जाएं, तो उसे बाबा बनते और तरक्की करते देर नहीं लगती। चमत्कार को नमस्कार करने वाली प्रजाति तर्क, तथ्य और विज्ञान के बारे में जानना भी नहीं चाहती। आज कुत्ता बाबा का आशीर्वाद लेने उमड़ी भीड़ भले ही अपने मां-बाप और बुजुर्गों का सम्मान न करे, लेकिन कुत्ता बाबा का आशीर्वाद हर हाल में चाहिए। बहरहाल, बनारस से बिजनौर वाले कुत्ता बाबा को मेरा भी प्रणाम पहुंचे।