वाराणसी ( काशी दीप विजन –हिंदी भाषा और साहित्य के उन्नायक भारतेंदु हरिश्चंद्र की 177वीं जयंती पर बुधवार को उनके आवास भारतेंदु भवन में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवन-यात्रा और साहित्यिक अवदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। व्योमेश शुक्ल ने कहा कि भारतेंदु एक ओर मर्यादा का नाम हैं तो दूसरी ओर मर्यादा के विवेकसम्मत अतिक्रमण का भी। उन्होंने शास्त्र, लोक, ज्ञान, कला, अभिजनता और साधारणता, स्त्री और पुरुष, हिंदी-अंग्रेजी, खड़ी बोली और ब्रज जैसे अनेक अंतर्विरोधों को अपने भीतर समाहित कर लिया था। उनका व्यक्तित्व हिंदीभाषी समाज के लिए एक ऐसे आसमान की तरह है, जिसके नीचे धरती, वृक्ष, फल-फूल और हमारे प्राणों को निर्धारित करने वाली सांस तक मौजूद है।
गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए आयुष राज्यमंत्री डॉ. दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ ने भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके कृतित्व से जुड़े स्मारकों के साथ अपने जीवन एवं सार्वजनिक जीवन के संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन प्रतीक शर्मा ‘विधु’ ने किया। अतिथियों का स्वागत भारतेंदु बाबू के वंशज दीपेश चंद्र चौधरी ने किया। इस अवसर पर डॉ. सुभाष चंद्र श्रीवास्तव, डॉ. अनुराग टंडन, डॉ. आमोद दत्त शास्त्री, पवन, अरविंद कुमार, शिवदत्त द्विवेदी, सिराज अहमद और भरत गुप्ता सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।