*अहंकारी,अयोग्य व्यक्ति,श्रेष्ठ के समान ही ,सभी से सम्मान चाहता ह।*
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*शुक्रनीति के,तृतीय अध्याय के,93 वें श्लोक में,दैत्यगुरु ने अहंकारी,मूढ़ स्त्री पुरुषों के स्वभाव का वर्णन करते हुए कहा कि-*
*मानमत्तो मन्यते स्म तृणवच्चाखिलं जगत्।*
*अनर्होऽपि सर्वेभ्यस्त्वत्यर्घासनमिच्छति।।*
इस जगत में,चार लाख प्रकार के स्त्री पुरुष प्राप्त होते हैं। किन्तु,इन चार लाख प्रकार के मनुष्यों को,दो प्रकार में ही पृथक पृथक किया गया है।
*(1) योग्य (2) अयोग्य*
गुणों के कारण ही योग्यता मानी जाती है। गुणों की न्यूनता के कारण ही अयोग्य माना जाता है।
पद,धन,आदर,ये तीन ही,इस संसार में, प्राप्ति के योग्य माने जाते हैं।
जिसकी जितनी बौद्धिक योग्यता होगी,उतना ही धन,पद और आदर हस्तगत होता है।
शारीरिक बल,सौष्ठव,कला आदि सभी की,अपनी अपनी विशिष्टता है।
बल और गुण,इन दोनों के कारण ही श्रेष्ठता प्राप्त होती है। आदर प्राप्त होता है।
यदि कोई स्त्री पुरुष, ईर्ष्यालु,द्वेषी,निंदक, अहंकारी,तिरस्कारी होते हैं तो,इस मानव समाज में,वे धनवान,बलवान, विद्वान,बुद्धिमान भी होंगे तो भी, सामाजिक सम्मान प्राप्त नहीं होता है।
इसका अभिप्राय यह है कि- गुणों से ही सम्मान प्राप्त होता है, दुर्गुणों से,दुराचार से सम्मान प्राप्त नहीं होता है।
दुर्गुणी,निर्बुद्धि, स्त्री पुरुषों को भी,ऐसी ही इच्छा होती है कि- समाज में सम्मान प्राप्त हो,किन्तु उनके दुर्गुणों के कारण ही उनको कहीं भी सम्मान प्राप्त नहीं होता है। क्यों कि- समाज ही उनको श्रेष्ठ नहीं मानता है।
शुक्राचार्य जी ने कहा कि-
*मानमत्तो मन्यते स्म तृणवच्चाखिलं जगत्।।*
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*मूर्ख,अहंकारी बलवान, स्त्री पुरुष,मानमत्त:,मान अर्थात अहंकार,उसके कारण,उन्मत्त होकर,अखिलं जगत्, अर्थात सम्पूर्ण जगत को,तृणवत् मन्यते स्म,तृण अर्थात तिनके के समान मानते हैं।*
*यही दुर्गुण ही तो,उनके पतन का और अपमान का कारण है।*
इस जगत में,बल बुद्धि,तथा धन और प्रभाव में एक से अधिक श्रेष्ठ होते हैं।
आपके शरीर में जितना बल है,उससे अधिक बल तो,लाखों स्त्री पुरुषों के शरीर में है। आपके जितनी बुद्धि है, उससे अधिक तीक्ष्णबुद्धि तो लाखों स्त्री पुरुषों के है। आपके जितना धन है, उससे अधिक धनवाले संसार में हैं।
आपसे सबकुछ अधिक,इस संसार में होता है।
किन्तु,अविवेकी, अहंकारी,मूढ़ स्त्री पुरुषों को ऐसा प्रतीत होता है कि- न तो,हमसे अधिक किसी के धन है,हमसे अधिक,न ही किसी के बल है,और न ही किसी के बुद्धि है,न ही मेरे समान किसी को ज्ञान है,न ही मेरे समान किसी का इतना प्रभाव है, इत्यादि प्रकार का अहंकार होने के कारण,ऐसे स्त्री पुरुष, सम्पूर्ण विश्व के स्त्री पुरुषों को तुच्छ समझते हैं। कुछ भी नहीं समझते हैं।
इसी बुद्धि को *”मानमत्त”* शब्द से कहा जाता है।
किन्तु ऐसे अनधिकारी भी अपने को सर्वयोग्य मानते हैं।
किन्तु ऐसे स्त्री पुरुषों की बुद्धि में क्या होता है तो, सुनिए!
*अनर्होऽपि* *सर्वेभ्यस्त्वत्यर्घासनमिच्छति।।*
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*अर्ह अर्थात योग्य,पात्र,अनर्ह अर्थात अयोग्य अपात्र। अपि अर्थात भी। श्रेष्ठ पद के लिए,आदर के लिए, सामाजिक सम्मान के लिए,अनर्ह:अपि अर्थात अयोग्य अपात्र होने पर भी,अहंकारी,दुष्ट मूर्ख स्त्री पुरुष,सर्वेभ्य:, अर्थात सभी से,अत्यर्घ, अर्थात आदर,आसन अर्थात उच्च पद को,इच्छति अर्थात चाहता है।*
*किन्तु,उस अयोग्य को,उच्चपद,श्रेष्ठता तथा आदर प्राप्त नहीं होता है।*
*इसका तात्पर्य यह है कि- इस संसार में प्रायः सभी स्त्री पुरुषों की यही इच्छा होती है कि-मैं कुछ भी भी करूं,मुझमें,वे गुण हों या न हों, किन्तु मुझे,अन्य श्रेष्ठ गुणी व्यक्तियों के समान ही,पद प्रतिष्ठा तथा सम्मान प्राप्त होना चाहिए।*
*किसी बलवान के कारण,यदि अयोग्य स्त्री पुरुषों को,उच्च पद पर आसीन कर भी दिया जाए तो,वे अपने अहंकार के कारण,उस पद के अनुसार,यश और सम्मान प्राप्त नहीं कर सकते हैं।*
*यही इस संसार का अकाट्य सत्य है।*
*व्यक्ति,शारीरिक बल के कारण,धन के अहंकार के कारण,बौद्धिक अहंकार के कारण,इस संसार में,कभी भी आदर सम्मान प्राप्त नहीं कर सकते हैं।*
*गुणों से ही आदर,प्रेम प्राप्त होता है,दुर्गुणों से अपात्रता से सम्मान प्राप्त नहीं होता है। पूज्य होने के लिए,गुणों की आवश्यकता होती है, दुर्गुणों की आवश्यकता नहीं होती है।